संध्या गौ माता लौटतेी है तो उनके पैरों से जो धूल उड़ाता है- उसे गोधूलि कहते हैं लाटा महाराज

रायपुर। श्री राजराजेश्वरी महामाया माता मंदिर सार्वजनिक न्यास समिति पुरानी बस्ती रायपुर के तत्वाधान में आयोजित राम जानकी विवाह के उपलक्ष में आयोजित नौवधा रामायण श्री राम कथा का आयोजन किया गया है। रामा कथा के प्रवचन कर्ता वाणी भूषण पं लाटा महाराज ने कहा कि श्री रामजी की बारात अवध से मिथिला चली। जनकपुर में बारात का बहुत स्वागत हुआ। विवाह का मुहूर्त नहीं निकला था।‌ ब्रह्मा जी ने विवाह का मुहूर्त अगहन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को निश्चित किया। जिस घोड़े में प्रभु दूल्हा बनकर बैठे थे वह घोड़ा कामदेव था। विवाह के पूर्व श्री राम को हल्दी लगाई गई।महाराज श्री ने कहा हल्दी खाने, लगाने, रोगों का निदान करने के लिए समसामयिक है। इसलिए विवाह के पूर्व वर वधु को हल्दी लगाई जाती है‌। ब्रह्मा जी के चार मुख है अर्थात आठ नेत्र है।

श्री राम के वर वेश का दर्शन उन्होंने 8 आंखों से किया, तो उन्हें बड़ा आनंद आया। कार्तिकेय जी के 6 मुख 12 नेत्र हैं‌। उन्होंने वर का दर्शन किया तो ब्रह्मा जी को दुख हुआ कि मेरे से डेढ़ गुना दर्शन कार्तिकेय प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन ब्रह्मा जी को कुछ निराशा हुई तो शंकर जी के पांच मुख एवं 15 नेत्र हैं। त्रिनेत्र होने से शंकर जी 15 नेत्रों से वर का दर्शन कर रहे हैं। किंतु इंद्र के हजार नेत्र हैं। गौतम ऋषि ने इंद्र को श्राप दिया तो उनके शरीर में हजारों छेद हो गए थे। कभी-कभी संत का श्राप आशीर्वाद हो जाता है और दुष्ट का आशीर्वाद भी श्राप हो जाता हैं । इद्र के हजारों क्षेत्र नेत्र बन गए और वह हजारों आंखों से वर का दर्शन किये। महाराज श्री ने भजन सुनते हुए गाया आज सीताराम का शुभ विवाह है, अजी वाह वाह है, श्रोतागण झूम कर नाचने लगे। आज विवाह पंचमी के दिन सीताराम आश्रम में विवाह संपन्न हो रहा है। दशरथ के दश रथ है। समाधिन 700 है। यात्रा करना हो तो एक रथ में 70-70 बैठेंगे। किंतु यह घर के अंदर की बात है। ऐसी सखियां हंसी उड़ते हुए विवाह का आनंद ले रही थी। दशरथ का बड़ा परिवार भागीरथ जैसा है। सीताराम के विवाह में विवाह मंडप मणियों से बना है। कोई लोहा लकड़ी नहीं है। राम सीता ने चार फेरा धर्म अर्थ काम और मोक्ष का लिया है। विवाह के बाद धर्म करना आवश्यक है। लेकिन धर्म और परिवार को चलाने के लिए अर्थ की आवश्यकता है। इसलिए धन भी जरूरी है। पितरों को पानी देने के लिए पुत्र की आवश्यकता है। इसलिए काम भी जरूरी है और अंत में गृहस्थ रहकर मोक्ष प्राप्त करना भी जरूरी है। सभी आश्रमों से बड़ा गृहस्थ आश्रम है। क्योंकि गृहस्थ ना होने से साधु संतों को भोजन कौन कराएगा। विवाह प्रारंभ होने पर जनक जी ने राम जी के हाथों सीता का हाथ रख दिया। मांग में सिंदूर भरते समय महाराज श्री ने भजन गया मोर सिया प्यारी भरिए मांग सिंदूर। उन्होंने सिंदूर की भी महिमा बताएं कि सिंदूर सुख और सौभाग्य में वृद्धि करता है। सिंदूर मां भगवती लगाती हैं। हनुमान जी, गणेश, भैरव जी भी सिंदूर लगाते हैं। विवाह की कामना करने वालों के लिए मां महामाया का भजन गाते हुए अविवाहित लोगों से कहा कि मां भगवती से विवाह का वरदान मांग ले। दुर्गा सप्तशती में लिखा है पत्नीँ मनोरमाम देहि, मनोवृतानुसारणीम। मां मुझे पत्नी दे और मेरे इच्छा के अनुरूप परिवार को चलाएं ऐसा वरदान दे। वर को कोबर में ले जाया गया। क्योंकि वर श्रेष्ठ होता है ऐसा कहते हैं। जहां यह निर्णय हो कि कौन श्रेष्ठ है। वर या वधू उस भवन को कोहबर कहा जाता है। महाराज श्री ने प्रभु के बालकांड का विस्तार से वर्णन करते हुए बताया की शिव जी सभी शक्तियों को गले लगाते हैं। शिव के शरीर में एक दूसरे के विरोधी विराजमान रहते हैं। लेकिन शिव परिवार में किसी को कोई क्षति नहीं होती। आज कल वर् की जूता चुराने की कथा का विस्तार करते हुए कहा कि श्री राम की पादुका बाद में चित्रकूट में मिली थी। पहले विवाह पश्चात कोबर में सीता जी की पादुका सहेलियों ने रख दी थी, जिसे भरत जी ने अपने सिर पर रखकर प्रणाम किया। राम सीता विवाह के बाद विवाह प्रसादमं मातृ शक्तियों को वितरित किया गया। जिसमें चुड़ी सिंदूर सौभाग्य की वस्तुएं शामिल हैं, उपस्थित महिलाओं को वितरित किया गया। विवाह के समय सखियां हंसी टिटौली करती हैं और कहती है अयोध्या की नारी कितनी होशियार है खीर खाकर पुत्रों को जन्म देती है। सखियों ने जवाब दिया कि हमारे मिथिला में न बाप की जरूरत न मां की जरूरत धरती से माता सीता का पुत्री के रूप में जन्म होता है। विदाई के समय माता पुत्री सीता को ज्ञान दे रही है पति के आज्ञा का पालन करना‌ सास ससुर गुरुजनों की सेवा करना। राजा जनक बेटी को गले से लगा लेते हैं। अंत में गुरु विश्वामित्र से जनक जी ने कहा कि महाराज आपके आशीर्वाद से सब संपन्न हो गया। महल सुना हो गया है। राजा जनक खम्बो को पड़कर रो रहे हैं। राम के साथ भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न का भी विवाह संपन्न हुआ। जब अयोध्या में चारों भैया आती है तो माता ने शगुन के रूप में कोई वस्तु नहीं बल्कि भगवान राम का हाथ सीता के हाथ में दे दिया। आज कल कलयुग में बहू के हाथ में सांस बेटे का हाथ नहीं देती और कहती है की बेटे को बहु ने ले लिया। क्यों नहीं होगा विवाह करके लाया है। बहू व उसके माता-पिता की प्रशंसा करें, बहु आपको प्रेम करेगी और हर घर में रामराज्य हो जाएगा। महाराज श्री ने क्रोध को नियंत्रित करने का सूत्र बताया कि माथे में कथा की भक्ति रखो कभी माथा गरम नहीं होगा। आज शनिवार को अयोध्या कांड जो प्रभु श्री राम लक्ष्मण भरत शत्रुघ्न के जवानी का वर्णन है उसकी व्याख्या की जाएगी तथा प्रभु के वनवास की कथा होगी। मंदिर व्यवस्थापक पं विजय कुमार झा ने अधिक से अधिक संख्या में महामाया मंदिर पधारकर सपरिवार राम रस का पान करने कीअपील की है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *