सोमवार को पूर्णिमा के पवित्र स्नान के साथ कार्तिक मास का समापन हुआ। पूरे कार्तिक माह में स्नान की परंपरा का पालन करते हुए भगवान विष्णु की पूजा की गई। 28 नवंबर से शुरू हुए अगहन महीने में भगवान विष्णु की पत्नी महालक्ष्मी की पूजा की परंपरा निभाई जाएगी। अगहन माह के प्रत्येक गुरुवार का विशेष महत्व है। इस साल 30 नवंबर को अगहन का प्रथम गुरुवार का पर्व मनाया जाएगा। अगहन माह में मां भगवती की उपासना शुभ फलदायी होती है। इस बार अगहन माह में कुल 4 गुरुवार पड़ेंगे।
30 नवंबर से शुरू होने वाले अगहन गुरुवार से एक दिन पहले 29 नवंबर बुधवार को अपने घर की साफ-सफाई करें। आंगन और मुख्य द्वार पर रंगोली सजाएं। मुख्य द्वार से लेकर पूजा स्थल तक चावल के आटे से मां लक्ष्मी के पैरों के निशान बनाएं। कलश स्थापित करें, आंवले और आम के पत्तों से बने तोरण को सजाएं और देवी लक्ष्मी की मूर्ति स्थापित करें। कटोरे में धान रखें और दीपक जलाएं। देवी लक्ष्मी का आह्वान करें और उन्हें अपने घर में आमंत्रित करें।
हर गुरुवार को भोर होते ही मां लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना होगी
सजाए जाएंगे घर-द्वार
गुरुवार को भोर होते ही मां की पूजा-अर्चना शुरू हो जाएगी। महिलाओं ने घर-द्वार सजाने के साथ ही पूजा की तैयारी मंगलवार से ही शुरू कर दी है। बुधवार को श्रद्धालु घर के द्वार से लेकर पूजा स्थल तक चावल आटे के घोल से मां लक्ष्मी के पद चिन्ह बनाएंगे। साथ ही आंगन में रंगोली बनाएंगे। गुरुवार की सुबह सूर्य निकलने से पहले गृह लक्ष्मियां यानी महिलाएं स्नान-ध्यान कर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करेंगी। यही क्रम दोपहर व शाम को भी चलेगा। इस बीच मां को तीनों टाइम अलग-अलग भोग अर्पित किया जाएगा।
अगहन गुरुवार की मान्यता
ऐसी मान्यता है कि अगहन गुरुवार में मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक का विचरण करने आती हैं। इस अवसर पर जो श्रद्धालु घर-द्वार की विशेष साज-सज्जा के साथ मां लक्ष्मी की विधिवत पूजा-अर्चना करता है। उसे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
चित्र 16 पूजा करने से पहले
अपना चेहरा 16 बार धोएं, 16 लड़ियों वाली एक डोरी बनाएं, मंडप को केले के पत्ते और आंवले से सजाएं और दीपक जलाएं। दोपहर के समय चावल के पकवान का भोग लगाएं. शाम को आरती करें और प्रसाद ग्रहण करें।
इन तारीखों को पड़ेगा अगहन गुरुवार
- 30 नवंबर
- सात दिसंबर
- 14 दिसंबर
- 21 दिसंबर
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