भानेश्वरी माता जयंती: ग्राम सिंघोला स्थित सिद्धपीठ माता भानेश्वरी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है

छत्‍तीसगढ़ के राजनांदगांव शहर से लगे ग्राम सिंघोला स्थित सिद्धपीठ माता भानेश्वरी मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां हर साल चैत्र व क्वांर नवरात्र में मेला भरता है। मंदिर में ज्योति कलश की स्थापना भी होती है। नवरात्र में मंदिर में दूर-दराज से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मंदिर को आकर्षक लाइटों से सजाया गया है। मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थापित ज्योति कलश के विसर्जन के दौरान पुरुष ही उठाते हैं।
भानेश्वरी देवी का जन्म सिंघोला गांव के एक मध्यम वर्गीय किसान सोमनाथ साहू के परिवार में नौ मई 1911 को भानुमति का जन्म हुआ। 12 वर्ष की उम्र में उसके शरीर में बड़े चेचक के दाने उभरने। इसके बाद गांव के शीतला मंदिर में माता का पर्व मनाया गया। मंदिर में पहुंचने के बाद भानुमति अपने आप हंसने व रोने लगीं। उन्होंने संकल्प लिया कि वह शीतला मंदिर में ही रहेंगी। आसपास के लोग भानुमति को माता मानने लगे। लोगों ने उन्हें भानेश्वरी माता का नाम दिया। विशेष धार्मिक पर्व में मां भानेश्वरी कील के कांटो से बने पाटा पर बैठती थी। आज भी कील के कांटो वाला पाटा मंदिर परिसर में है।
ये है मान्यता

माता भानेश्वरी ने एक साल पहले ही मौत की भविष्यवाणी कर दी थी। उनके आदेश पर मंदिर परिसर में ही उनके लिए समाधि स्थल का निर्माण कराया गया। माता भानेश्वरी ने यहां तीन नवंबर 1975 में समाधि ली। इसके बाद यहां मुख्य मंदिर बनाया गया। मान्यता है कि यहां आने वाले श्रद्धालुओं के दुख माता की भभूति से दूर होते हैं। हर साल यहां मेला भी भरता है। नवरात्र में ज्योति कलश के साथ नौ दिनों तक विशेष पूजा-अर्चना होती है।

सिंघोला के भानेश्वरी मंदिर में नवरात्र में मंदिर में विशेष पूजा-आराधना होती है। इस स्थल को श्रद्धालु  तीर्थ स्थल के रूप में मान्यता देते है। माता की भभूति से कई श्रद्धालुओं के दुख दूर होते हैं। मंदिर के पास माता का तालाब है, जहां वह स्नान करती थी। इस तालाब को माता तालाब के नाम से जाना जाता है। यहां तालाब के बीच मां दुर्गा मंदिर का निर्माण कराया गया। नवरात्र में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *