हथनी तो दफन हो गई पर सवाल नही हुआ दफन,जिले में वन्य जीवो के संरक्षण और संवर्धन के नाम पर लाखों करोड़ों खर्च,पर मौतों का सिलसिला लगातार जारी,आखिर जिम्मेदार कौन?

हथनी तो दफन हो गई पर सवाल नही हुआ दफन,जिले में वन्य जीवो के संरक्षण और संवर्धन के नाम पर लाखों करोड़ों खर्च,पर मौतों का सिलसिला लगातार जारी,आखिर जिम्मेदार कौन?

परमेश्वर कुमार साहू@ गरियाबंद।वनमण्डल गरियाबंद के अंतर्गत जंगली जीव की सुरक्षा अब केवल भगवान भरोसे रह गया है।जिसमे पिछले कुछ सालों में जंगली जीव की अवैध शिकार और मौत की घटना कम होते नही दिख रही है। ऐसे में ताजा मामला एक बार फिर हाल ही में सिकासार जलाशय में मादा हाथी के मौत के बाद उठने लगी है।ये वही मादा हाथी है जो बीते दो सप्ताह पूर्व धमतरी जिले में पांच लोगो को मौत के घाट उतारकर एक रोज पहले गरियाबंद जिले में प्रवेश किया था और उसके दूसरे दिन ही सिकासार जलाशय में हथनी को मृत पाए जाना कई सवालों को जन्म दे रहा है।क्योंकि धमतरी जिले में जब हमले कर रहे थे तो हथनी को लेकर व उसके खराब स्वास्थ को लेकर विभाग द्वारा कोई जानकारी नहीं दिया गया था।वही गरियाबंद जिले में आते ही उनकी मौत हो जाना वन विभाग के कार्यप्रणाली पर कई सवाल पैदा कर रहा है।बता दे की यह जिले में पहला मामला नहीं है इससे पहले भी तीन हाथियों की मौत हो चुकी है।साथ ही जिला मुख्यालय से लगे क्षेत्रों में तेंदुवा का भी मृत पाए जाना कई तरह के सवाल पैदा करते है।इसी तरह पांडूका वन परिक्षेत्र के किसी गांव में जहर देकर यूरिया पानी देकर पांच हिरणों को मारा गया था।हालांकि इस मामले की जानकारी विभाग के अधिकारियों को है पर उन्होंने पूर्व की भांति जंगल और जंगली जीवो से कोई सरोकार नही रखते हुए मामले में संज्ञान तक नही लिया।इसी तरह मादा हाथी को मौत के बाद भी कई तरह की सवालों की झड़ी लगी हुई है।लेकिन हमेशा की तरह मामला कुछ दिन गर्म रहता है फिर कुछ दिनों बाद ठंडे बस्ते में चला जाता है।जिसे विभाग अच्छी तरह से जानता है।

आखिरकार इन जंगली जीवो का कोई घर परिवार तो होते नही है जो इनके ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाए।अगर परिवार वाले होते तो जांच करवाते ,पुलिस थाना जाते और कोर्ट जाकर न्याय की गुहार लगाते।वही वेटनरी विभाग के डाक्टरों के भरोसे इन जीवो का पोस्टमार्टम होता है पर पोस्टमार्डम की रिपोर्ट सही नही होने की वजह से वन विभाग के अनुसार रिपोर्ट तैयार की जाती है। जिसमे सच्चाई समाज के सामने नहीं आती है और इन बेजुबान जानवरो को न्याय नहीं मिल पाता और यह सिलसिला जिले के वनमण्डल और उदंती अभ्यारण्य के जंगलों में वन्य जीवों के ऊपर यह खेल खूब खेला जा रहा है। जंहा राजकीय पशु वनभैंसा सही कई वन्य जीवो के मौत के मामले में किसी भी प्रकार से न तो कोई जांच हुआ और न ही किसी जिम्मेदार के ऊपर कोई कार्यवाही ।अगर इसी तरह चलता रहा तो जिले में वन जीवो की संरक्षण और संवर्धन के नाम पर करोड़ो रूपए का बंदरबाट होते रहेगा।इस तरह कागजों में वन विभाग की कार्यप्रणाली संचालित होती रहेगी।बहरहाल मादा हाथी को ससम्मान दफन तो कर दिया है पर सवाल अब भी बाकी है।

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