लॉकडाउन में बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर, नेटवर्क विहीन क्षेत्रों में ज्यादा बुरी स्थिति


शैलेन्द्र ठाकुर @ दंतेवाड़ा। कोविड-19 के संक्रमण काल में हुए लॉक डाउन और लगातार स्कूल बंद रहने से दक्षिण बस्तर में बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ा है। कोरोना संक्रमण की दो लहरों के दौरान स्कूल पूरी तरह बंद रहे। इस दौरान बच्चों की पढ़ाई के लिए ऑनलाइन कक्षाओं को विकल्प देकर इसकी भरपाई करने की कोशिश की गई, लेकिन दक्षिण बस्तर जैसे पिछड़े इलाके में इसका फायदा पूरी तरह नहीं मिल पाया। दो लहरों का संक्रमण थमने के बाद स्कूल खुले भी तो प्रायमरी स्कूलों के लिए पहली कक्षा में दाखिले के लिए बच्चों को तलाशना मुश्किल हो गया, क्योंकि लॉक डाउन के वक्त से आंगनबाड़ी केंद्र भी लंबे समय तक बंद रखे गए थे, जहां से पहली कक्षा से पहले के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है।
ऑनलाइन पढ़ाई के फायदे
छत्तीसगढ़ सरकार ने बच्चों की पढ़ाई के लिए ऑनलाइन विकल्प देते हुए पढ़ई तुंहर द्वार जैसी योजना लांच की, लेकिन इसका फायदा सिर्फ शहरी और अर्धशहरी ऐसे क्षेत्रों में मिल सका, जहां मोबाइल कवरेज की सुविधा है। चूंकि दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा जिले के 40 फीसदी से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां मोबाइल पर इंटरनेट चलाने लायक स्पीड तो दूर सामान्य बातचीत के लिए 2जी नेटवर्क तक उपलब्ध नहीं है। ऐसे में बच्चों से ऑनलाइन क्लास अटेंड करवाना शिक्षकों व पालकों के लिए बड़ी चुनौती साबित हो रही है। इसके अलावा शिक्षा के मामले में पिछड़े जिले में पालकों को पढ़ाई के महत्व के बारे में भी अब तक जागरूक नहीं किया जा सका है। ऐसे में पालक अपने बच्चों के लिए स्मार्ट फोन का इंतजाम करने में बारे में सोच भी नहीं सकते हैं। ऐसे क्षेत्रों के बच्चे पढ़ाई में काफी पिछड़ चुके हैं। हालांकि, राज्य सरकार ने शिक्षकों के जरिए ऐसे इलाकों में मोहल्ला क्लास की व्यवस्था की। इसमें भी कोरोना संक्रमण की पहले दौर में मोहल्ला क्लास लेना शिक्षकों के लिए अनिवार्य की बजाय वैकल्पिक ही रहा था। चूंकि वायरस के बारे में आम दुनिया भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं थी, सिर्फ आशंकाएं ही हवा में तैर रही थीं, लिहाजा कुछेक शिक्षकों ने ही अपनी जान जोखिम में डालकर नदी-नाले पार करते हुए गांवों में जाकर ऑनलाइन कक्षाएं चलाई।
साइड इफेक्ट
ऑनलाइन क्लास से नुकसान यह हुआ कि सिर्फ शहरी व अर्धशहरी इलाकों में बच्चों ने इसके जरिए पढ़ाई की। दूरस्थ क्षेत्रों व कमजोर मोबाइल नेटवर्क वाले इलाके के बच्चे इस पढ़ाई में पिछड़ते चले गए हैं। वहीं दूसरी तरफ, भौतिक रूप से लगने वाली कक्षा के मुकाबले ऑनलाइन कक्षाओं में बच्चे गणित व अन्य विषयों पर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं कर सके। 4 से 6 घंटे स्कूल में बिताने वाले बच्चों को सिर्फ 1 घंटे की ऑनलाइन पढ़ाई के जरिए किताबों के साथ जोड़े रखना काफी मुश्किल काम साबित हुआ है, नतीजतन पहले अपनी कक्षाओं में अव्वल रहने वाले बच्चे भी 2 साल के अंतराल में अपना आत्मविश्वास और पहले सीखी हुई बातें भूल चुके हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत प्रायमरी कक्षाओं में हो रही है, जहां बच्चों को जोड़-घटाव, गुणा-भाग, गुणनखंड जैसे सामान्य गणितीय संक्रियाओं में भी पिछड़ा हुआ पाया गया है। इसका खुलासा दूसरी लहर की विदाई के बाद कुछ माह तक लगी ऑफलाइन कक्षाओं में हुआ है। ऑनलाइन परीक्षाओं में पालकों के सहयोग से अच्छे नंबर लाने वाले ज्यादातर बच्चे ऑफलाइन लिए गए यूनिट टेस्ट में फिसड्‌डी साबित हुए। यह चुनौती आगामी समय में ऑफलाइन आयोजित होने वाली 10 वीं व 12 वीं बोर्ड की परीक्षाओं में भी सामने आने की आशंका जताई जा रही है। प्री-बोर्ड कक्षाओं में घर से असाइनमेंट की तर्ज पर उत्तर पुस्तिकाएं लिखकर जमा करने वाले बच्चों का सामना इस बार बोर्ड कक्षाओं में ऑफलाइन परीक्षा से होना है। इस बीच कोविड संक्रमण की तीसरी लहर की शुरूआत भी हो चुकी है।
शारीरिक व मानसिक प्रभाव
ऑनलाइन कक्षाओं का सबसे बड़ा साइड इफेक्ट ये रहा कि पहले जो पालक अपने बच्चों को मोबाइल से दूर रखा करते थे, उन्हें भी पढ़ाई के नाम पर बच्चों को घंटों मोबाइल थमाना पड़ा। इसका फायदा बच्चों ने गलत तरीके से उठाया। ऑनलाइन क्लास के अलावा बाकी समय भी मोबाइल पर घंटों आंखें गड़ाए बच्चे खेलकूद व अन्य शारीरिक गतिविधियों से दूर हो चुके हैं। इसका दुष्प्रभाव वजन बढ़ने और आंखों की कमजोर होती रौशनी के रूप में भी सामने आ रहा है।
आर्थिक दुष्प्रभाव
ऑनलाइन पढ़ाई के बहाने बच्चों को अपने परिजनों से महंगे स्मार्ट फोन खरीदवाने का मौका मिल गया। इसका सबसे ज्यादा नुकसान मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों को उठाना पड़ा है। पढ़ाई में बच्चे पिछड़ न जाएं, इसके लिए परिजनों को अपने घरेलु बजट में समझौता का रास्ता अपनाने मजबूर हुए। साथ ही मोबाइल रीचार्ज करने से लेकर अन्य तमाम खर्च का लागत भी गरीब परिवारों पर बढ़ता गया है।

वर्चुअल दुनिया से बाहर निकालने की कोशिश हो
कोविड ने पूरे मानव जीवन को प्रभावित किया, इससे हमारे बच्चे भी अछूते नहीं रहे। बच्चे का सर्वागीण विकास स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ खेल कूद से भी होता है, लेकिन कोविड की वजह से पढ़ाई आनलाईन हो गई है, जिसका असर बच्चों की मानसिक स्थिति पर देखने को मिल रहा है। बच्चों का रूझान अब वर्चुअल खेलों की ओर ज्यादा है। आनलाईन खेलों में ज्यादा समय बीतने के कारण पूरी नींद नहीं लेते हैं, जिसके कारण चिड़चिड़ापन बढ़ाने लगा है बेवजह जिद करना छोटे बच्चों की आम समस्या के रूप में देखा जा रहा है। टीनएजर्स बच्चों में सोशल मीडिया के प्रति बढता रूझान वास्तविक समाजिक जीवन से दूर ले जा रहा है। जिसका सीधा असर उनकी जीवन शैली पर साफ नजर आ रहा है। अब समय आ गया कि कोविड के साथ जीवन को देखते हुए बच्चों को वर्चुअल दुनिया से बाहर निकालने के लिए सभी को प्रयास किया जाए।

  • तरूण कुमार कुर्राम, संस्थापक, भोर सेवा समिति दंतेवाड़ा

बच्चों की दक्षता में आई कमी
लगभग दो वर्षों से कोविड काल के बाद स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा स्कूलों का ऑफलाइन संचालन प्रारम्भ हुआ था, लेकिन तीसरी लहर की वजह से फिर स्कूलों को बंद करना पड़ा। इससे छोटे बच्चे खासकर पहली से आठवीं तक के विद्यार्थी, जिनके पास न मोबाइल है, न इंटरनेट, ऐसे बच्चो की शिक्षा ज्यादा प्रभावित हुई है। छोटे बच्चों को गाइडलाइंस की अधिक आवश्यकता होती है। जिनके पास मोबाईल है, वो बगैर परिजनों की मॉनीटरिंग के मोबाइल का दुरूपयोग ज्यादा कर रहे हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो हमारे बच्चो की दक्षता में कमी आयी है।

  • सूर्यकान्त सिन्हा, शिक्षक, दंतेवाड़ा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *