छुरा :- नगर के हृदय स्थल मानस मन्दिर सभा भवन में श्राद्ध पर्व पर नगर वासियों द्वारा पितरों के निमित्त सामूहिक रूप से श्रीमद भागवत महापुराण कथा ज्ञान सत्संग उत्सव का आयोजन किया गया है। कथा के तीसरे दिन भागवताचार्य प. त्रिभुवन महाराज जी ने ध्रुव , सती, एवं भरत चरित्र का वर्णन किया। जिसे सुनकर जहां सैकड़ों की संख्या में मौजूद श्रोता भाव विभोर हो उठे। संगीतमय भजनों को सुनकर झूमते दिखे।
श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन कथावाचक ने कहा कि भागवत कथा के श्रवण से श्रोताओं को सद्मार्ग पर चलने की सीख मिलती है। उन्होंने एक संदर्भ में बताया कि ध्रुव की भक्ति के आगे स्वयं भगवान विष्णु को प्रकट होना पड़ा था। ध्रुव की सौतेली मा सुरुचि ने जब उन्हें राज सिंहासन पर बैठने को ले कर अपमानित किया तो वह अपने एक पैर पर खड़े होकर भगवान विष्णु की तपस्या में लीन हो गए। उनकी तपस्या से प्रसन्न भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि अनेकों वर्षों तक धरती पर राज करने के बाद वह उनकी गोद अर्थात आकाश में ध्रुव तारा बनकर सदा के लिए स्थापित हो जाएंगे और पूरे ब्रह्मांड को प्रकाशित करते रहेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सिर्फ भगवान का नाम ही मनुष्य को संकटों से उबार मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। भक्त अगर सच्चे मन से ईश्वर की उपासना करता है तो ईश्वर उसकी मनोकामना पूरी करने पर मजबूर हो जाता है। कलयुग में सिर्फ ईश्वर का नाम लेने से मनुष्य के सारे कष्ट खत्म हो जाते हैं। महराज जी ने कहा कि भागवत पुराण जैसी धार्मिक कथाएं मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता का प्रवाह करते हुए उसे सत मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। समय निकाल कर कुछ देर तक सच्चे मन से इस कथा का श्रवण करने वाले भक्तों की मनोकामना भगवान जरूर पूरी करते हैं। इसके अलावा भागवताचार्य ने सती चरित्र की कथा विस्तार पूर्वक बताते हुए कहा कि…
: परायण कर्ता मानस मन्दिर के पुजारी पण्डित यज्ञेश प्रसाद पाण्डेय है उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम छुरा नगर के वरिष्ठ जन व परिजनों द्वारा पितरों के निमित्त सामूहिक रूप में करवा रहे है। कार्यक्रम में श्रीमती काजल प्रहलाद पटेल, श्रीमती शकुन्तला रेकचंद देवांगन,श्रीमती रधिकाओंप्रकाश यादव श्रीमती संतोषी यशवंत यादव, तेजस्वी यादव, जगदीश प्रसाद देवांगन,सैलेंद्रदिक्षित,मनोज चंद्राकर,हरीश यादव,कुंदन यादव, राजेश यादव, खूबचंद चंद्राकर, फुलकुवर यादव, उषा बाईं साहू, श्रीमती गंगा पुरोहित, मीना यादव, द्रोपदी दीवान, सागर साहू, हरीश,महेश शंकर सचदेव उनके परिवाजनों व नगर के वरिष्ठ जन माताएं ,बहने श्रोतागण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
भगवान शिव की अनुमति लिए बिना उमा अपने पिता दक्ष के यहां आयोजित यज्ञ में पहुंच गईं। यज्ञ में भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिए जाने से कुपित होकर सती ने यज्ञ कुंड में आहुति देकर शरीर त्याग दिया। इससे नाराज शिव के गणों ने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया। इसलिए जहां सम्मान न मिले वहां कदापि नही जाना चाहिए।
प्रवचन कर्ता ने भरत चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भरत चरित्र की महिमा का वर्णन तो त्रिदेव, ब्रह्मा, विष्णु, महेश यहां तक कि श्रीराम भी करने में असमर्थ थे। मैं कौन सी महिमा का वर्णन करूं, सिर्फ भरत जी के विषय में परिचय दे सकता हूं। उनके चरित्र का वर्णन करना सबके बस की बात नहीं है। उन्ननहो ने कैकेई की कुटिलता बताते हु बोले माता कैकेई ने विवाह से पूर्व ही राजा दशरथ से शर्त करा ली थी कि मेरे गर्भ से जन्म लेने वाला बालक ही राजा बनेगा। इस सन्धि पर गुरुदेव वशिष्ठ, मंत्री सुमन्त, राजादशरथ, कैकैनरेश और माता कैकेई स्वयं ये पांचो लोगों ने हस्ताक्षर किया था। समझौता पत्र पर इसलिए गुरु वशिष्ठ बोले ,जो पांचों मत लागै निका इसी बात का फायदा उठाते हुए मंथरा ने कैकेई को अपने पक्ष में कर लिया। द्यार्न राम भरतति की अनुहारी सहसा देखि न सकहि न नारी का वर्णन करते हुए बताया कि करि शृंगार पलना पौढ़ाये अर्थात माता कैकेई ने राम और भरत का शृंगार करके एक बार एक ही पलंग पर सुला दिया। कुछ दे बाद विस्मित हो गयी कि इसमे राम कौन है और भरत कौन है। तीनों माताएं स्वयं राजा दशरथ विस्मित हो गये कैसे पहचाना जाय। तब गुरु वशिष्ठ जी ने दोनेां की पहचान बताई। कहा कि जिसका मुख राम जी के चरणों की ओर हो वही भरत होगा और जो भरत जी के मुख को ताकता होगा वहीं राम होगा। आज वहीं भरत प्रयागराज से निज धर्म को त्यागकर राम जी के चरणों की अनुरक्ति मांग रहे हैं।
श्रीमद भागवत महापुराण कथा ज्ञानसत्संग उत्सव के पराय बदले स्वयं के लिए नरक मांग लिया। तब प्रभु ने कहा कि प्रह्लाद नरक में हमारा वास नहीं है, वहां तुम मेरे दर्शन कैसे करोगे।
भक्त प्रह्लाद ने उत्तर दिया कि प्रभु मेरे गुरुदेव नारद ने मुझे बताया है कि आप न तो बैकुंठ में रहते हो और न योगियों के हृदय में। आप तो वहां जहां आपके भक्त आपका कीर्तन करते हैं, वहां प्रेमाकुल होकर निवास करते हैं। इसलिए मैं आपके नाम का सुमिरन और कीर्तन करके नरक में भी आपके दर्शन कर लूंगा। भक्त प्रह्लाद का उत्तर सुनकर प्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक प्रह्लाद को हृदय से लगा लिया।
इसके साथ ही फूलों की होली खेलकर भक्तों ने कथा का आनंद लिया। ज्योति जागृति संस्थान के युवा एवं योग्य संत समाज ने मधुर व भावपूर्ण भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे। संयोजिका साध्वी लोकेशा भारती ने बताया कि प्रह्लाद को मारने के लिए हिरण्यकश्यप ने बहुत प्रयास किए लेकिन वह हर बार विफल रहा। इसका कारण था कि प्रह्लाद के पास ब्रह्मज्ञान था। ब्रह्मज्ञान अर्थात वह ज्ञान जो मनुष्य को ईश्वर के तत्व कूप से जोड़ दे। ब्रह्मज्ञान सिर्फ ब्रह्मनिष्ट गुरु द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।परायण कर्ता पण्डित यज्ञेश प्रसाद पाण्डे मानस मन्दिर पुजारी छुरा ने बताया की यह श्रीमद भागवत महापुराण कथा पितरों के निमित्त सामूहिक रूप से नगर के वरिष्ठ जन व परिजनों द्वारा कराया जा रहा हैं।सत्संग में माताएं, बहने वरिष्ट गन बड़ी संख्या में उपस्थित थे। एक सच्चा और ईश्वर की भक्ति में लीन व्यक्ति भी गलत संगत में पड़कर निकृष्ट और अधम हो जाता है। वह अपने जीवन के मूल उद्देश्य को भूलकर काम क्रोध मद लोभ में पड़कर भोग और विलास से ग्रसित हो जाता है। जरूरी है कि हम हमेशा इस बात को लेकर चौकन्नो रहें कि हमारी संगती कैसी है। क्या हम अनजाने में ही पापकर्म में लिप्त हो रहे हैं। इसके लिए हमें बीच बीच में सत्संग की जरूरत होती है।
छुरा नगर के मानस मन्दिर में श्राद्ध पक्ष पर नगर वासियों द्वारा आयजित श्रीमद भागवत महापुराण कथा ज्ञान सत्संग उत्सव में कथा वाचक प.त्रिभुवन महाराज जी ने ब्यास पीठ से श्रोतां जनों से कहा।
उन्होंने बताया कि आज अपने दैनिक जीवन में हम ऐसे उलझे हैं कि पता ही नहीं चलता और जाने अनजाने हमसे पाप होते रहते हैं। आचार्य ने यह भी बताया कि अपने जीवन के अंतकाल में अजामिल ने अपने पुत्र नारायण को आवाज लगाई। लेकिन यह आवाज भक्तवत्सल भगवान ने भी सुनी और अजामिल को यमदूत की प्रताड़ना से मुक्त किया।
जरूरी है कि हम हमेशा इस बात को लेकर चौकन्नो रहें कि हमारी संगती कैसी है। क्या हम अनजाने में ही पापकर्म में लिप्त हो रहे हैं। इसके लिए हमें बीच बीच में सत्संग की जरूरत होती है।
वहीं महाराज जी ने भक्त प्रह्लाद की पुकार और नरसिंह अवतार के आगमन का प्रसंग सुनाकर भक्तों को भाव विभोर कर दिया।कथा व्यास ने बताया कि भक्त प्रह्लाद जब अपनी मां कयादु के गर्भ में थे तभी उन्हें गुरु नारद द्वारा ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो गई थी। गुरु की प्रेरणा से ही उनके भीतर भगवान हरि के प्रति अनन्य प्रेम जागृत हुआ। शास्त्रों के अनुसार जब नरसिंह भगवान हिरण्यकश्यप का वध कर भक्त प्रह्लाद को अपनी गोद में बैठाकर प्रेमपूर्वक पूछा मांगो तुम्हें क्या वर चाहिए तब प्रह्लाद ने हिरण्यकश्यप सहित अन्य सभी पापी आत्माओं का कल्याण मांगा और उनके बदले स�
