*मौन अवधि में प्रचार के आरोप पर सुप्रीम कोर्ट के रुख से भूपेश बघेल से जवाब मांगने का समय*भाजपा जिला दुर्ग की उपाध्यक्ष श्रीमती हर्षा लोकमणि चंद्राकर ने एक विज्ञप्ति जारी कर कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा कथित वोट चोरी को लेकर पाटन में रैली निकाल कर पाटन की जनता को क्या संदेश देना चाह रहे है। जबकि 2023 के पाटन विधानसभा चुनाव में प्रचार समाप्त होने के बाद लागू 48 घंटे की मौन अवधि में भूपेश बघेल द्वारा स्वयं लाव-लश्कर, गाजे-बाजे और समर्थकों के साथ प्रचार किए जाने का आरोप हाईकोर्ट में चुनाव याचिका में लगा है।
इस मामले को प्रारंभिक स्तर पर खत्म कराने की कोशिश को सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2026 को स्वीकार नहीं किया। वर्तमान में कुछ दिनों पूर्व सुनवाई टालने के उद्देश्य से चार बिंदु जोड़ने अपील की गई थी जिसे हाईकोर्ट ने निरस्त करते हुए मामला साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ाने आदेश दिए।
यह स्थिति अपने आप में गंभीर सवाल खड़े करती है जब चुनाव प्रचार की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी, तब कथित रूप से प्रचार क्यों किया गया? क्या कानून आम प्रत्याशी और कांग्रेस के बड़े राजनीतिक नेताओं के लिए अलग-अलग है?श्रीमती हर्षा चंद्राकर ने कहा कि पाटन की जनता जानना चाहती है कि क्या मौन अवधि में मतदाताओं को प्रभावित करने का कथित प्रयास उनके स्वतंत्र मताधिकार में हस्तक्षेप नहीं था? मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि “वोट चोरी” कोई न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं है; अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।
लेकिन यदि मौन अवधि के उल्लंघन के आरोप साक्ष्यों से प्रमाणित होते हैं, तो यह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर बेहद गंभीर सवाल होगा। भूपेश बघेल को कथित वोट चोरी पर राजनीति करनी है तो पहले स्वयं के ऊपर चल रहे हाईकोर्ट के मामले पर जवाब देना चाहिए फिर आरोप लगाना चाहिए।
क्या भ्रामक राजनीतिक बयानबाजी करने से पूर्व भूपेश बघेल को कथित वोट चोरी पर सबूत नहीं देना चाहिए? क्या चुनाव आयोग पर आरोप लगाने से पूर्व विधायकी पद से इस्तीफा नहीं देना चाहिए? इन गंभीर सवालों का जवाब पाटन की जनता के सामने देना चाहिए।
