तेलीबांधा सिर्फ एक नाम नहीं, साहू समाज की आस्था, पहचान और गौरव है—नाम बदलने की राजनीति बंद करे सरकार”

नाम बदलने के बजाय अस्पताल, शिक्षा, रोजगार, महिला सुरक्षा और कानून-व्यवस्था पर ध्यान दे सरकार : मधुकांत साहू

पाटन। तेलीबांधा केवल एक चौक या स्थान का नाम नहीं है, बल्कि यह साहू समाज सहित छत्तीसगढ़ के लोगों की आस्था, पहचान, इतिहास और सामाजिक स्मृति से जुड़ा हुआ नाम है। ऐसे ऐतिहासिक एवं भावनात्मक नाम को बदलकर “सेवा संकल्प ज्योति चौक” किए जाने की प्रस्तावित कवायद का साहू समाज पुरजोर विरोध करता है।

साहू समाज की ओर से युवा सह संयोजक, तहसील साहू संघ पाटन मधुकांत साहू ने कहा कि सरकारों का काम जनता की समस्याओं का समाधान करना है, न कि बार-बार छत्तीसगढ़ के पुरखों, परंपराओं और आस्था से जुड़े नामों को बदलना। यदि सरकार को विकास करना है तो अस्पतालों की व्यवस्था सुधारे, शिक्षा व्यवस्था मजबूत करे, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करे, महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार पर रोक लगाए और प्रदेश में बढ़ती चाकूबाजी, हत्या, लूटपाट, अपराध एवं कानून-व्यवस्था की समस्याओं पर कठोर कार्रवाई करे।

उन्होंने कहा कि आज छत्तीसगढ़ की सड़कें, स्वास्थ्य व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, रोजगार और प्रशासनिक व्यवस्था सुधार की मांग कर रही हैं। किसानों, मजदूरों, युवाओं और आम नागरिकों की समस्याएं सरकार के सामने हैं। ऐसे समय में बार-बार चौक-चौराहों और स्थानों के नाम बदलने की राजनीति करना जनता के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने जैसा है।

भाजपा और कांग्रेस—दोनों सरकारों से सवाल

मधुकांत साहू ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता, संस्कृति और विरासत की रक्षा की लड़ाई है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार से भी सवाल है और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार से भी।

भाजपा सरकार के कार्यकाल में पचपेड़ी नाका का नाम परिवर्तन, बूढ़ातरिया का नाम परिवर्तन, कोटरा तरिया का नाम परिवर्तन, तेलीबांधा क्षेत्र का नाम मरीन ड्राइव किए जाने जैसे विषयों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं और अब तेलीबांधा चौक के नाम परिवर्तन की चर्चा ने साहू समाज की भावनाओं को आहत किया है।

वहीं पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में भी छत्तीसगढ़ की संस्कृति और तीज-त्योहारों को वह सम्मान नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा छत्तीसगढ़वासियों को थी। छत्तीसगढ़ के पारंपरिक तीज-त्योहारों और सांस्कृतिक पर्वों को प्राथमिकता देने के बजाय ऐसे अवसरों पर छुट्टियां और व्यवस्थाएं की गईं जिनका छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति से सीधा संबंध नहीं था।

उन्होंने कहा कि सत्ता किसी भी दल की हो, छत्तीसगढ़ की संस्कृति और पहचान से खिलवाड़ स्वीकार नहीं किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ महतारी और पुरखों के सम्मान का सवाल

मधुकांत साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता केवल राजनीतिक भाषणों में नहीं, बल्कि हमारे पुरखों, देवी-देवताओं, तीज-त्योहारों, लोकपरंपराओं, लोककला, लोकभाषा और ऐतिहासिक प्रतीकों में बसती है।

पूर्व में छत्तीसगढ़ महतारी की प्रतिमा को लेकर विवाद, बसना में शहीद वीर नारायण सिंह की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने की घटना, गिरौदपुरी धाम के जैतखाम को नुकसान पहुंचाने की घटना तथा कवर्धा में पालो को नुकसान पहुंचाए जाने जैसी घटनाओं ने छत्तीसगढ़वासियों की भावनाओं को आहत किया है। ऐसे मामलों में सरकारों को संवेदनशीलता और कठोरता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि 5 दिसंबर 2025 को सर्व छत्तीसगढ़िया समाज द्वारा राज्यपाल के समक्ष आवेदन देकर यह स्पष्ट किया जा चुका है कि छत्तीसगढ़ के पुरखों, महापुरुषों और आस्था से जुड़े नामों को बार-बार बदला नहीं जाना चाहिए। इसके बावजूद यदि नाम बदलने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती है तो यह छत्तीसगढ़िया समाज की भावनाओं की अनदेखी होगी।

हमारे तीज-त्योहार ही हमारी पहचान हैं

छत्तीसगढ़ की पहचान केवल नक्शे पर बनी सीमाओं से नहीं है। हमारी पहचान है—

हरेली, पोरा, तीजा, भोजली, आठे, छेरछेरा, कमरछठ, मातर, गौरा-गौरी, देवारी, अक्ति,ददरिया, राउत नाचा, पंथी, सुआ और हमारे पुरखों की परंपराएं।

यही हमारी संस्कृति है, यही हमारी विरासत है और यही आने वाली पीढ़ियों को हमारी पहचान से जोड़ने वाली धरोहर है।

सरकारों को चाहिए कि इन परंपराओं को मजबूत करने के लिए नीतियां बनाए, छत्तीसगढ़ी भाषा को सम्मान दे, स्थानीय संस्कृति को बढ़ावा दे और हमारे पारंपरिक पर्वों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का काम करे।

“नाम नहीं, काम बदलकर दिखाए सरकार”

मधुकांत साहू ने कहा कि जनता आज पूछ रही है—

अस्पताल कब सुधरेंगे?
शिक्षा व्यवस्था कब सुधरेगी?
युवाओं को रोजगार कब मिलेगा?
महिलाएं कब सुरक्षित होंगी?
बेरोजगारी और पलायन कब रुकेगा?
अपराध और चाकूबाजी पर कब लगाम लगेगी?
सड़कों और मूलभूत सुविधाओं की स्थिति कब सुधरेगी?

इन सवालों का जवाब देने के बजाय यदि सरकार नाम बदलने में अपनी ऊर्जा लगाएगी तो छत्तीसगढ़ की जनता इसे स्वीकार नहीं करेगी।

सरकार तत्काल निर्णय वापस ले—अन्यथा होगा चरणबद्ध आंदोलन

साहू समाज सरकार से मांग करता है कि तेलीबांधा चौक का नाम बदलने का निर्णय तत्काल वापस लिया जाए और छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक महत्व वाले नामों को राजनीतिक निर्णयों से बदलने की परंपरा पर रोक लगाई जाए।

यदि सरकार ने निर्णय वापस नहीं लिया तो साहू समाज लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से विरोध प्रदर्शन, मुख्यमंत्री के पुतला दहन सहित चरणबद्ध बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होगा, जिसकी संपूर्ण जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।

छत्तीसगढ़िया समाज से एकजुट होने की अपील

मधुकांत साहू ने कहा—

“तेलीबांधा का नाम केवल साहू समाज का विषय नहीं है। यह सवाल है कि क्या किसी सरकार को छत्तीसगढ़ के किसी भी पुरखा, समाज, संस्कृति और आस्था से जुड़े नाम को अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार बदलने का अधिकार होना चाहिए?”

उन्होंने साहू समाज सहित समस्त छत्तीसगढ़िया समाज, सामाजिक संगठनों, युवा साथियों और संस्कृति-प्रेमी नागरिकों से अपील की कि वे इस विषय पर एक मंच पर आएं और छत्तीसगढ़ की पहचान, संस्कृति एवं विरासत की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज बुलंद करें।

साथ ही उन्होंने सामाजिक मुद्दों पर लगातार संघर्ष करने वाले छत्तीसगढ़िया क्रान्ति सेना से भी आग्रह किया कि वह छत्तीसगढ़ की अस्मिता और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े इस विषय को गंभीरता से लेते हुए इस लड़ाई में समाज के साथ खड़ी हो।

“सरकार कोई भी हो, सत्ता किसी की भी हो—छत्तीसगढ़ की संस्कृति, पुरखों की पहचान और समाज की आस्था से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अब छत्तीसगढ़िया समाज चुप नहीं बैठेगा।”

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