पाटन।उन्हें सोचना पड़ेगा की उनका पतन क्यों हूवा कारण को ढूढना जरूरी हो जाता है क्षीर सागर का मंथन वस्तुतः अपने मन का मंथन है जिसमे अच्छे विचार,बुरे विचारक प्रदुर्भव होता है हमे विकाश या उत्थान करना है तो मन में अच्छे विचारों को लेकर चलना पड़ेगा अभी मानव समाज का विकाश हो पाएगा। आप को वैचारिक मंथन करना है तो जिस प्रकार मंदराचल का सहारा लिया गया उसी प्रकार मन रूपी समुद्र को प्रेमरूपी डोरी अर्थात वासुकी,का उपयोग कर मन को बांधा जा सकेगा लेकिन सर्वत्र प्रेम बटाते आगे बढ़ना पड़ेगा।

ज्ञान और भक्ति जब दूरी होती है तब पाखंड रूपी राक्षस का उद्भाव होता है जब ज्ञान रूपी सूर्य और भक्ति रूपी चंद्रमा में दूरी होती है तब राहु केतु जैसे पाखंड रूपी राक्षस का जन्म होता है इसलिए जीवन को सार्थक बनाना है तो ज्ञान और भक्ति को कभी मत त्यागना,उक्त विचार केसरा में आयोजित भागवत महापुराण की समुद्र मंथन की कथा पर चर्चा करते हुवे बालयोगी विष्णु अरोड़ा जी ने कही रविवार को पांचवे दिन की कथा कृष्ण जन्म और उनकी बाल लीलाओं पर विस्तार पूर्वक वर्णन की आज की कथा में रविंद्र दानी सहपरिवार,संतराम कुंभकार,अशोक सपहा,अशोक पटेल,लखन साहू,नेतराम सिन्हा,शोभाराम यादव,पवन निर्मलकर, खेम लाल सिन्हा, कपिल सिन्हा,सहित हजारों की संख्या में दूरस्थ अंचलों से बड़ी संख्या में पधारे श्रोता उपस्थित थे, सुबह बोरेंदा की महिला मानस मंडली ने सुमधुर भजन गाकर मन को मोहित कर दिया।
