रायपुर,,पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के जैव प्रौद्योगिकी अध्ययन शाला द्वारा, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), नई दिल्ली तथा आईआईटी भिलाई इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी फाउंडेशन, भिलाई के संयुक्त तत्वावधान में “औषधीय पौधों के स्वदेशी ज्ञान की अग्रिम सीमाओं” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन 7 अक्टूबर 2025 को किया गया। इस कार्यशाला का उद्देश्य बस्तर समुदाय में प्रचलित औषधीय पौधों की पहचान, संरचना, संरक्षण एवं खेती से जुड़े पारंपरिक ज्ञान को पुनर्स्थापित करना था।
इस कार्यशाला के मुख्य अतिथि विकस मरकाम , अध्यक्ष, छ.ग. जनजातीय पारंपरिक स्वास्थ्य एवं औषधीय पौधे बोर्ड; डॉ राजीव प्रकाश, निर्देशक, आईआईटी भिलाई, भिलाई एवं श्री जी. धम्मशील, भारतीय वन सेवा, वन अधिकारी थे। श्री विकस मरकाम जी ने अपने उद्बोधन में प्रत्येक गाँव में पारंपरिक वैद्यराजों की उपस्थिति एवं औषधीय पौधों के दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर जोर दिया, साथ ही श्री जी. धम्मशील, ने ‘जल-जंगल-यात्रा’ पहल का उल्लेख करते हुए बताया कि किस प्रकार स्वदेशी ज्ञान को स्वास्थ्य और पर्यटन से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने वैद्यराजों को प्रोत्साहन एवं मंच प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे औषधीय पौधों के उपयोग और उपलब्धता को बढ़ावा मिल सके।कार्यक्रम के पहले शैक्षणिक सत्र में डॉ. के. एस. करभाल, आयुर्वेदिक महाविद्यालय, रायपुर; ने “पंचविध कषाय कल्पना” पर विस्तृत व्याख्यान दिये और पारंपरिक चिकित्सा में इसके उपयोगों की जानकारी प्रदान की। इसके पश्चात डॉ. प्रणय वाल, निदेशक, पीएसआईटी फार्मेसी, एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, डायबपोर्ट हेल्थकेयर, कानपुर; ने ऑनलाइन सत्र में भारत की जैव विविधता और अश्वगंधा के औषधीय गुणों पर प्रकाश डाला।
वहीं, डॉ. नागेंद्र सिंह चौहान, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी, ड्रग टेस्टिंग लैबोरेटरी और रिसर्च सेंटर, रायपुर, ने त्रिफला तथा औषधीय पौधों के चिकित्सकीय महत्व को रेखांकित करते हुए राज्य में सक्रिय हर्बल उद्योगों की भूमिका बताई।अगले सत्र में आमंत्रित वक्ता निर्मल कुमार अवस्थी, निदेशक, परंपरागत ज्ञान एवं वानौषधि विकास फाउंडेशन, ने अपनी संस्था की गतिविधियों को साझा किया एवं एंटीबायोटिक प्रतिरोध की चुनौती, पौधों में पाए जाने वाले प्राकृतिक एंटीबायोटिक्स तथा जियोटेक्नोलॉजी के माध्यम से पौधों की निगरानी की उपयोगिता पर भी विस्तार से जानकारी दी। उनके साथ पधारे वैद्य श्री कश्यप जी, वैद्य शामेलाल जी, श्री कृष्ण मोहन श्रीवास्तव जी एवं वैद्य युवराज नेताम जी ने मांडूकपर्णी, अर्जुन, गिलोय आदि जैसे विभिन्न औषधीय पौधों के पारंपरिक उपयोगों का प्रदर्शन एवं व्याख्या की, जिससे प्रतिभागियों को व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुआ।
अंतिम सत्र में आमंत्रित वक्ता कन्हैया लाल साहू, अध्यक्ष, पारंपरिक वैद्य वानौषधि संघ, अचोली ने आयुर्वेदिक औषधीय पौधों के महत्व और स्वास्थ्य संवर्धन में उनकी भूमिका पर एक ज्ञानवर्धक भाषण दिया। उनके उद्बोधन में आधुनिक समय में पारंपरिक चिकित्सा को हो रही वास्तविक कठिनाइयों को उजागर किया । कार्यक्रम के समापन सत्र में कुलपति प्रो. सचिदानंद शुक्ला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर, ने पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के संरक्षण एवं वैश्विक प्रसार की आवश्यकता पर बल देते हुए आयोजन की सराहना की। सभी विशिष्ट अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।
अंत में डॉ. नागेंद्र कुमार चंद्रवंशी (कार्यक्रम सचिव) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्राध्यापको एवं प्रतिभागियों के योगदान के लिए आभार व्यक्त किया। इस परियोजना मे कार्य कर रहे सभी शोध कर्ताओ ने भाग लिया, इस कार्यक्रम में कुल 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
