ठाकुर साहब — सादगी, अनुशासन और आदर्श का प्रतीक व्यक्तित्व**बीटीआई के दिनों का वो स्वर्णिम दौर, जो फिर कभी नहीं लौटा**ठाकुर अम्मा का विशाल हृदय और संस्कारों से सजी कॉलोनी की यादें*

अखिलेश नामदेव *अन्ना*नर्मदा कुंज परिवार बी टी आई कॉलोनी विद्यानगर पेंड्रा की कलम से संस्मरण

*विनम्र श्रद्धांजलि**नमन ठाकुर साहब* *ईमानदारी की मिसाल : जब मंत्री मित्र का प्रस्ताव ठुकरा दिया ठाकुर साहब ने**संस्मरण जो मुझे याद है*80 के दशक में बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान (बीटीआई) का जो जलवा देखा गया, वैसा अनुशासन और गरिमा फिर कभी नहीं देखी गई। उस दौर में संस्थान के प्रमुख ठाकुर साहब थे — सादगी, अनुशासन और सेवा भावना के प्रतीक। उनका जीवन जितना अनुशासित था, उतना ही अनुशासित उनका संस्थान भी था। लगभग दो दशक तक वे अपने परिवार सहित पेंड्रा में रहे। शची दीदी, शरद भैया, विवेक भैया की शादियाँ भी यहीं के लोगों के बीच परिवारिक माहौल में हुईं।बीटीआई कॉलोनी का ठाकुर साहब का मकान अपने आप में एक पहचान था, साफ-सुथरा आंगन, सजे परदे, खिड़कियाँ और पीछे अमिया की छांव। इस परिसर की गरिमा ऐसी थी कि आम व्यक्ति बिना अनुमति वहाँ प्रवेश करने की हिम्मत नहीं करता था।ठाकुर अम्मा का विशाल हृदय, उनकी मधुर वाणी और स्नेहिल स्वभाव ने कॉलोनी की महिला मंडली को एकजुट किया।

मेरी मां का उनसे आत्मीय संबंध था, और इसी बहाने हमारा परिवार अक्सर उनके घर जाया करता था। कॉलोनी में एकमात्र टीवी ठाकुर अम्मा के घर थी, जहाँ चित्रहार, विक्रम-बेताल और दादा जी की कहानियाँ देखने के लिए मैं उत्सुकता से पहुंच जाता था।बाबूजी याने ठाकुर साहब की सादगी भी अद्भुत थी। घर पर सफेद धोती और बनियान में उनका व्यक्तित्व बहुत ही सौम्य लगता था। जब मैं पहुंचता, तो वे मुस्कराकर अम्मा से कहते — “देखो, अन्ना आया है…” और मुझे टीवी वाले कमरे में बुला लेते। वे बीच बीच मेरा बौद्धिक परीक्षण करते फिर कहते — “अन्ना को कुछ खिलाओ।” वह स्नेह आज भी यादों में जीवित है।सेवानिवृत्ति के बाद जब ठाकुर साहब रायपुर में बस गए, तब भी उनसे हर मुलाकात में वही अपनापन महसूस होता था। जब भी मैं रायपुर जाता , वे न केवल हमारे हालचाल पूछते, बल्कि हर उस व्यक्ति के बारे में जानकारी लेते, जो उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रहा।

बातचीत के दौरान वे पिताजी का जिक्र बड़े स्नेह से करते — पिताजी कभी-कभी इंजेक्शन लगाने उनके घर जाया करते थे, हमारे पिता जी स्वास्थ विभाग की सेवा के साथ सप्ताह में एक दिन रविवार जो छुट्टी का होता है, उसे अपने निजी व्यवसाय में उपयोग करते , उनकी मेहनत को ठाकुर साहब सदा याद रखते और कहा करते — “नामदेव जी ने बहुत संघर्ष किया, पर परिवार को सहेजा।”हमारे तीनों बड़े भाइयों के बारे में भी विस्तार से पूछते, और उनकी स्थिति जानकर आत्मसंतोष व्यक्त करते। यह उनका स्वभाव था — जुड़ाव को कभी औपचारिक नहीं होने देना उनकी खासियत थी।ठाकुर साहब की ईमानदारी की एक घटना आज भी स्मृतियों में ताजा है।

इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में स्नातक अध्ययन के दौरान उनके रूममेट मनोहर पोतेदार थे, जो आगे चलकर केंद्र सरकार में पेट्रोलियम मंत्री बने। मंत्री पद पर पहुंचने के बाद जब उन्हें पता चला कि ठाकुर सुरेश कुमार पेंड्रा के बीटीआई में पदस्थ हैं, तो उन्होंने उनसे फोन पर कहा —“ठाकुर साहब, आपके पाँच बच्चे हैं, मैं पाँच पेट्रोल पंप स्वीकृत करा देता हूँ, खर्च मैं उठाऊंगा, आप सिर्फ फॉर्म भेजिए।”ठाकुर साहब ने मुस्कराकर कहा — “मनोहर जी, बच्चों में जो क्षमता होगी, वे खुद पाएंगे। मुझे ऐसे सहयोग की आवश्यकता नहीं।” यह उत्तर उनके चरित्र की सच्ची झलक थी — सादगी में गरिमा, और ईमानदारी में आत्मगौरव।

*श्रद्धांजलि — एक युग का अंत*तीजा त्यौहार के दिन ठाकुर अम्मा का स्वर्गवास पूरे परिवार और परिचितों के लिए गहरा आघात था। ठाकुर साहब ने इस असहनीय दुख को भी ईश्वर की इच्छा मानकर संतुलित जीवन जारी रखा। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे स्वास्तिक विचारधारा के अनुरूप शिक्षाविद् और मार्गदर्शक बने रहे, और रायपुर में भी अपनी पहचान बनाई।आज ठाकुर साहब हमारे बीच नहीं हैं, पर उनके द्वारा छोड़े गए संस्कार, आदर्श और सादगी की छाप आज भी हर उस व्यक्ति के मन में जीवित है, जो उनसे कभी जुड़ा रहा।मैंने अपने नर्मदा कुंज परिवार की ओर से उनके निवास जाकर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किए और परिवार के सदस्यों — शची दीदी, जीजाजी, छोटू, भाभी, बबलू भैया-भाभी — से भेंट कर उनकी आत्मीयता महसूस की।ठाकुर साहब और ठाकुर अम्मा की स्मृतियाँ आज भी पेंड्रा और रायपुर, दोनों की मिट्टी में बसती हैं

भावभीनी श्रद्धांजलि के साथ अखिलेश नामदेव *अन्ना*नर्मदा कुंज परिवार बी टी आई कॉलोनी विद्यानगर पेंड्रा

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