युवकों के प्रेरणास्रोत छत्तीसगढ़ के वयोवरिष्ठ शिक्षाविद् एवं समाजसेवी (96 वर्षीय) सुरेश ठाकुर

इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र की कलम से,,,,

रायपुर,,, सुरेश ठाकुर का जन्म 14 जनवरी 1930 को गुजरा गांव पाटन में पुष्पूर्णिमा (धनधान्य का त्योहार छेर छेरा पुन्नी) को हुआ था उनके पिता पण्डित ध्रुवनाथ ठाकुर नगर के एक श्रेष्ठतम शिक्षक माने जाते थे।

उनके पूर्वज एवं परिवार इस अंचल में 16 वीं शताब्दी से निवासरत रहे है रानी दुर्गावती के राजपुरोहित पण्डित महेश ठाकुर को अकबर युगीन दिल्ली से दरभंगा राज का ताम्रपत्र मिला था। वे वहां के राजा बनकर चले गए और उनके भाइयों का परिवार जबलपुर के (गढ़ा मण्डला) से जगदलपुर चले गए बस्तर के राजगुरु बने खैरागढ़ के राजगुरु एवं अनेक राजाओं के प्रशासनिक मार्गदर्शक रहे रजवाड़ा एवं जमींदारियों में राज गुरु,राज ज्योतिषी,राज पुरोहित आदि पदों पर कार्यरत रहे इन्होंने ने यहां के राजनीतिक एवं सांस्कृतिक उन्नयन में योगदान दिया छत्तीसगढ़ का पहला शिलालेख मां दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा प्रवेश पश्चात लगा हुआ है जिसे मैथिल पण्डित भगवान मिश्र राजगुरु ने 1703 ई. में छत्तीसगढ़ी और संस्कृत में लिखा था।

ठाकुर साहब का परिवार बाद में सकलोर आ गया जो समाज एवं कृषकों के हित में रहे इस परिवार में अनेक शिक्षाविद् हुए जिसमें डॉ रत्न कुमार ठाकुर कुलपति पण्डित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय बने जिनके कार्यकाल में प्रशासनिक भवन का नाम वीर नारायण सिंह के नाम पर रखा गया। ठाकुर साहब की प्राथमिक शिक्षा खैरागढ़ में हुई।जहां पदुमलाल पुन्नालाल बक्शी जी का उन्हीं स्नेह मिला और खैरागढ़ राजघराने परिवार का ज्ञान मिला।

माध्यमिक शिक्षा भाटापारा मिशन स्कूल में हुआ जहां म्युनिसिपल बॉडी के अध्यक्ष उनके पिता लोकप्रिय शिक्षाविद् ध्रुवनाथ ठाकुर रहे(1947) इंटर एवं B A की शिक्षा छत्तीसगढ़ कॉलेज रायपुर में दानदाता कामतादाऊ एवं प्राचार्य योगानंदम से संपर्क हुआ।

M.A. इन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से किया जहां तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष चंद्रशेखर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह पूर्व प्रधानमंत्री माखनलाल फोतेदार पूर्व केंद्रीय मंत्री राजनारायण पूर्वमंत्री होस्टल में रहते थे हरिवंश राय बच्चन इंग्लिश के प्रोफेसर थे वहीं पर उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ ग्रामीण उन्नति पर एक प्रोजेक्ट में काम किया था।

पारिवारिक जीवन के अंतर्गत 1953 में इनका विवाह हुआ तब से 1990 तक शिक्षा विभाग में कार्यरत रहे। मुंगेली बिलासपुर पेंड्रा जांजगीर बालकों BTI में प्राचार्य बने उन्हें शासन ने DIET डाइट की जिम्मेदारी दी जिसे बाद में पूरे मध्यप्रदेश में लागू किया गया राजनेताओं के दबाओ के बावजूद उन्होंने बिलासपुर की अपेक्षा पेंड्रा स्थापित करवाया इसीलिए उनका स्थानांतरण सेवानिवृत्त से कुछ समय पूर्व मुंगेली बिलासपुर कर लिया गया जहां से 1990 में सेवानिवृत्त हुए l

सेवानिवृति पश्चात भी वे शिक्षा के माध्यम से सेवारत रहे विद्याभारती के NCERT के सदस्य उसके स्पेशल पॉवर कमेटी के सदस्य पाठय पुस्तक के पाठ्यक्रम समिति के सदस्य एवं 2003 से 2010 तक प्रगति कॉलेज बीएड के प्रोफेसर रहे 2014 तक महंत कालेज बीएड के प्रोफेसर रहे थे l थीओसॉफिकल सोसाइटी के सदस्य के रूप में और अध्यक्ष के रूप में लगभग 10 वर्षों तक कार्य किया।उनके गांव सकलोर के पास हीरमी में सीमेंट कंपनी के निर्माण के समय किसानों के मुआवजा के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया।ताकि किसानों के पक्ष में अनेक तर्क दिए जिसे पूर्व कमिश्नर ने सराहा था इस कार्य में उनको काफी सफलता मिली थी।उनके पिता जी पण्डित ध्रुवनाथ ठाकुर 1945 में रायपुर में मैथिल ब्राह्मण समाज की स्थापना की थी और युवक सुरेंद्र मिश्र जो उनके छात्र रहे की सहभागिता को सराहा था।

कालांतर में श्री सुरेश ठाकुर जी ने महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व एवं कर्तव्य को आगे बढ़ाया था।छत्तीसगढ़ में सरस्वती शिशु मंदिर के विकास में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही वे मृदुभाषी सरल हृदय एवं निश्छल स्वभाव के युवकों के प्रेरणास्रोत निर्भिक वक्ता थे उनके अंतिम ओजस्वी विचारों से वृंदावन सभाकक्ष में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा नीति के उदगार से पता चलता है कि वे कितने भावी पीढ़ी के प्रति शुभचिंतक थथे।

शोध छात्र शुभम के शब्दों में उन्होंने कहा था युवकों के संबंध में Heart , Mind, Emotional के बारे में बहुत अच्छे विचार रखे थे तथा शिक्षा के बारे में उनके विचार सदैव प्रासंगिक रहेंगे। शिक्षा के चार प्रकार के बारे में उन्होंने बताया पहला फॉर्मल एजुकेशन, दूसरा इनफॉर्मल एजुकेशन, तीसरा मोरल एजुकेशन, चौथा कल्चरल एजुकेशन।आपका आकस्मिक निधन 28 सितम्बर 2025 को हुआ आप के निधन से छत्तीसगढ़ की अपूरणीय क्षति हुई है उनकी स्फूर्ति व्यवहार बोलचाल स्वास्थ्य को देखकर लगता था कि वे शतकाधिक हमे मार्गदर्शन करेंगे।उन्हें छत्तीसगढ़ की ओर शत शत नमन,,,,,, आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र इतिहासकार

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