रायपुर। श्री राजराजेश्वरी महामाया माता मेंदिर पुरानी बस्ती में राम विवाह के उपलक्ष में जारी श्रीराम कथा के चतुर्थ दिवस कथाकार पं शंभू शरण लाटा महाराज ने श्रोताओं को बताया कि राजा मोरध्वज ने अपने युवा पुत्र को ब्राह्मणों को दान कर सपत्नीक आरी से काटकर अमर हो गए थे। हमारे जीवन में सूर्य को अर्ध जरूर देना चाहिए। गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने कहा है कि बिना सूर्य को जल दिए भोजन ग्रहण करने से पाप लगता है। लाटा महाराज ने कहा बिजली का उपयोग करते हैं तो बिल पटाते हैं। सूर्य प्रकाश और ऊर्जा देती है, तो हमें उसको जल देना चाहिए। गुरु बनने पर गुरु दक्षिणा का प्रस्ताव रखा तो महाराज श्री ने कहा आप केवल गुरु दक्षिणा के रूप में अपने माता-पिता के चरणों में सर रखकर प्रणाम करें,यही गुरु दक्षिणा है। सर झुकाने से आयु विद्या बल की प्राप्ति होती है। गुरु विश्वामित्र के सामने प्रभु राम ने मारिच, सुबाहु,अन्य राक्षसों का संहार किया। राजा मोरध्वज ने उनके महल में पधारे ब्राह्मणों को वचन दिया कि आप जो मांगोगे मैं सब दूंगा। तन मन प्राण सर्वस्व आपको निछावर है।

ब्राह्मणों ने उनके इकलौते पुत्र को आधा काटकर दान में मांग लिया। राजा रानी अत्यंत दुखी परेशान थे। ब्राह्मणों ने कहा कि आरी से अपने बेटे के सर को दो भाग में कटकर एक भाग हमारे शेर को खिलाने और दूसरा भाग अपने महल में रखने के लिए यदि तैयार हैं तो हम दान में लेंगे लेकिन ब्राह्मणों ने शर्त रख दिया कि आरी से काटते समय आंसू नहीं बहाना चाहिए। अंततोगत्वा दुखी परेशान राजा रानी ने अपने पुत्र से यह बात बताया। कलयुग में पिता पुत्र को ज्ञान देते हैं। लेकिन यह भारत भूमि है। राजा के बालक रूपी पुत्र ने माता-पिता को ज्ञान दिया और कहा कि आप दुखी मत हो यह हमारा सौभाग्य है। अंत में पूरी कथा में महाराज श्री ने बताया कि दो ब्राह्मण क्रमशः स्वयं श्री कृष्ण व अर्जुन थे। शेर यमराज बनकर राजा के दरबार में आया था। श्री कृष्ण परीक्षा ले रहे थे। जिस परीक्षा में मोरध्वज राजा व रानी जीत गए। तब कहा गया की गंगा में जब तक रहेगा पानी, तब तक मोरध्वज की रहेगी कहानी। इस प्रकार मोरध्वज अमर हो गए। आचार्य जी ने बाबा तुलसीदास का स्मरण करते हुए कहा तुलसीदास ने रामायण लिख गंगा बहा दिया, भवसागर पार करने का नौका बना दिया। राजा दशरथ ने अपने दोनों पुत्र राम लक्ष्मण को गुरु विश्वामित्र के हाथ सौंप दिया और कहा कि अब आप इनके पिता है। बालको को लेकर गौतम ऋषि आश्रम में गए। राम लक्ष्मण पहली बार अयोध्या से बाहर निकले हैं। अहिल्या को पत्थर से नारी बनाकर उनका उद्धार किया। अहिल्या ने कहा की जीवन में गलती को छुपाना नहीं चाहिए। पाप या गलती को छुपाना नहीं चाहिए और धर्म को बताना नहीं चाहिए। छुपाने से ज्यादा प्रचारित होता है। महाराज श्री ने कहा आप पूजा में क्या सामग्री लाए हैं यह विषय नहीं है। बल्कि पूजा में आपकी भाव कितनी है यह महत्वपूर्ण है। लक्ष्मी का विस्तार करते हुए बताएं की लक्ष्मी ज्यादा होने से धन ज्यादा होने से अनर्थ होता है, पाप होता है। जब लक्ष्मी की आकांक्षा हो तो नारायण का भी ध्यान करना चाहिए। जब अकेले लक्ष्मी आती है तो पाप, दरिद्र, शराब जुआ में खर्च होता है। लेकिन जब साथ में नारायण आते हैं तो लक्ष्मी परोपकार में शिक्षा, धर्म कर्म में गरीब के पैरोकार और स्वास्थ्य में लगता है। इसलिए हमेशा लक्ष्मी नारायण कै एकसाथ आमंत्रित करना चाहिए। गुरु को यह ज्ञात था कि धनुष यज्ञ में केवल श्री राम ही धनुष तोड़ेंगे और सीता से विवाह करेंगे। न्यास समिति के अध्यक्ष आनंद शर्मा, वरिष्ठ सदस्य शेखर दुबे व मंदिर व्यवस्थापक पं विजय कुमार झा ने बताया है कि आज 6 दिसंबर को सीताराम विवाह यज्ञ संपन्न होगा। अधिक से अधिक संख्या में राम कथा में शामिल होकर राम रस का पान करें।
