आस करण जैन की खबर
जामगांव आर।श्रमण संघ की चार जैन साध्वियां परम पूज्य प्रियदर्शना श्रीजी , विचक्षणा श्रीजी ,सुकृति श्री जी एवम सुप्रज्ञप्ति श्री जी का गुरुवार को जामगांव आर आगमन हुआ। जैन श्री संघ सदस्यो ने अहो भाव के साथ आगवानी करते हुए लाभ लिया। धर्म सत्संग एवम प्रवचन सभा का आयोजन कोचर परिसर में किया गया।शुक्रवार 10 बजे सरस्वती शिशु मंदिर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जामगांव आर में परीक्षा पर मोटिवेशनल व्याख्यान जैन साध्वी श्री विधार्थियो को देंगे।जैन साध्वियो का होली चातुर्मास डौंडी लोहारा में होगा।जैन श्री संघ जामगांव आर ,भिलाई 3
दुर्ग के सदस्यो ने लाभ लिया।
आत्मा को परमात्मा बनाना है तो भ महावीर की जीवनी को आत्मसात करे,,,,
जैन साध्वी प्रियदर्शना श्री जी ने कहा कि
आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए परमात्मा महावीर के 27 भवों का स्वाध्याय करे परमात्मा बनने का मार्ग दिखने लगेगा।अन्नत पुन्यवाणी के कारण दुर्लभ मानव जीवन मिला है इसे ना समझी में नही गवाए। पूर्वजों से विरासत में धन जायजद तो मिल गए लेकिन आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना पड़ेगा भगवान महावीर की राह चलना पड़ेगा।
कर्मो की निर्जरा सम भाव से करना चाहिए,,,,,
श्रमण संघ की प्रखर वक्ता जैन साध्वी प्रियदर्शना श्री जी ने कहा कि रिश्ते यू ही नही मिला करते ये तो कर्मो की अनुरूप मिलते है और कर्मो के अनुरूप राग द्वेष सब चलते रहते है।अपनो से जब विद्वेष पैदा हो जाए तो समभाव रखते हुए कर्मो की निर्जरा करना चाहिए।जैसे भगवान पार्श्वनाथ ने कई जन्मों तक कम्मठ के विद्वेष को सम भाव के साथ निर्जरा करते गए और परम पद को प्राप्त करने में सफल हो गए।कर्मो के अनुसार ही प्रेमी द्वेषी पैदा होते है।यह श्रृंखला भी कर्मो के अनुरूप ही चलते रहती है।
कर्मो के खेल निराले होते है,कभी दोस्त दुश्मन बन जाते है और दुश्मन दोस्त
कर्मो के खेल इतने निराले है कि कब दोस्त दुश्मन बन जाए पता ही नही चल पाता,राग द्वेष के बीच रिश्तों की मिठास खटास में बदल जाती है और खटास मिठास में बदल जाती है।इसी लिए लोग कह उठते वक्त बड़ा बलवान होता है किससे कौन सा रिश्ता कब बन जाए और कब बिगड़ जाए।जैन साध्वी श्री ने कहा कि कोई करीबी से द्वेष प्रसंग उत्पन्न हो जाए तो
आप द्वेष नहीं पाले।मन को समझाए पल दो पल का जीवन प्रभु के द्वार जाना है कर्मो की निर्जरा करने आए है निर्जरा करते करते आत्मा को परम आत्मा बनाना है।
शुभ कर्म करने संतोषी जीव को सुख नसीब होती है,,,,,,
जैन साध्वी सुकृति श्री जी ने कहा कि भौतिक साधन संपन्न अपने आप को सुखी मानने की भूल कर रहे वास्तव में सुख उनके इर्द गिर्द ऑल इज वेल की कहावत को जुबा पर सुशोभित करते है लेकिन शुभ कर्म करने वाले परोपकारी संतोषी जीव को सुख नसीब होती है।उन्होंने कहा 8 कर्मो 18 पापो से निवृत्त होते हुए विचारो को शुद्ध करते हुए चेतना जगाए।जीवन सार्थक होने लगेगा।
