खबर हेमंत तिवारी राजिम / शुक्रवार से पितृ पक्ष पखवाड़ा प्रारंभ हो गया है। इस पखवाड़ा में लोग अपने पितरों को तर्पण करेंगे। पितृपक्ष में कौवों का विशेष महत्व होता हैं। भारत वर्ष के हिन्दू धर्म में श्राद्ध पक्ष के समय कौवों का विशेष महत्त्व बताया गया है। प्रत्येक श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है। लेकिन देश में कौओं की संख्या लगातार घट रही है स्थिति यह है कि घर की मुंडेर पर बैठकर मेहमानों के आने की सूचना देने वाला काला काग यानि कौआ अब धीरे धीरे विलुप्ति के कगार पर होने के कारण अब बहुत ही कम दिखाई देता हैं। जिसके कारण लोगों को अब पितृ पक्ष में कौवा

ढूंढने से भी नही मिल रहा हैं और न ही दिखाई दे रहा हैं। कौवों की संख्या में गिरावट होने के कारण बमुश्किल कुछ लोगों को ही कौवों को खाना खिलाने के सौभाग्य प्राप्त हो रहा हैं।ढूंढने से भी नही दिखाई देते कौवा- ऊंची-ऊंची इमारतों की छत पर लगे टीवी एंटीना के कोने पर अब कौवे बैठे नजर नहीं आते, उनकी कांव-कांव का शोर अब कानों को नहीं बेधता, एक समय था जब कौए सभी जगह आसानी से दिखाई दे जाते थे, किंतु आज इनकी तेज़ी से घटती संख्या के कारण ही अब इनकी गणना एक दुर्लभ पक्षी के रूप में की जा रही है। इसे प्रकृति की मार कहें या पर्यावरण में आया बदलाव मगर आज कौवे की आधी से अधिक प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। कौओं की लगातार कम होती संख्या के दो कारण है। पहला यह है कि वातावरण में अचानक जो परिवर्तन हो रहा है और खाद्य पदार्थों में जो ज़हरीली चीजें आ रही हैं, उनकी वजह से कौओं की प्रजनन क्षमता में कमी आने लगी है। दूसरी वजह यह है कि पेड़ो की अंधाधुंध कटाई से इनके लिए आवास की समस्या उत्पन्न हो गई है। कौओं का स्वभाव है कि वे एकांत में अपना घोंसला बनाते हैं जो आजकल उन्हें कम मिल पा रहा है।कौंदकेरा हायर सेकंडरी स्कूल की विज्ञान विषय की व्याख्याता शिक्षिका मीनाक्षी शर्मा ने बताया कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़, प्रदूषण, वृक्षों की कटाई, मोबाइल टावरों की बढ़ती संख्या से कौआ की प्रजाति भी विलुप्त होने का मुख्य कारण है। पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद कौआ की घटती संख्या गंदगी को भी बढ़ा रही है। उन्होंने बताया कि बर्ड लाइफ इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार एशिया में मुख्य रूप से ढ़ाई हजार से अधिक पक्षियों की प्रजातिया पायी जाती है। इनमें से सवा तीन सौ प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर है। भारत में 73 विलुप्त हो रहे पक्षियों में कौआ भी शामिल है। कौआ गंदगी साफ करने वाला पक्षी है। इसका समाप्त होना मनुष्य के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है। कौआ कोरडेटा संघ के वर्ग एब्ज के गमपेशरी फार्मिश से आता है। हमारे यहां दो प्रजातियां पायी जाती है। एक कोर्वस स्प्लोडेन्स जो धूसरा रंग का होता है, उसे देशी कौआ मानते है। दूसरा कोर्वस मेंक्रोरिहकोज कहलाता है। जो काला होता है तथा जंगली माना जाता है। कौआ किसानों का सच्चा मित्र भी कहलाता है। खेत जुताई के समय किट, टिड्डीयों के बाहर आते ही वह चट कर जाता है। इन दिनों खेतों पर उनकी संख्या ना के बराबर होती है। घर के आस पास फैली गंदगी सड़े गले फल अनाज, मृत पशु, भोज आदि आयोजन में फेंकें गये खाद्य सामग्री को कौआ अपना भोजन बना कर गंदगी को साफ भी करते है।पितरों को उनके मृत्यु तिथि के अनुसार करते हैं तर्पण- हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का काफी खास महत्व होता है। पितृ पक्ष में लोग अपने पितरों का श्राद्ध और तर्पण करते है। इस दौरान पितरों की उनके मृत्यु तिथि के अनुसार उनका तर्पण किया जाता है और उनका मनपसंद खाना भी बनाया जाता है। पितृ पक्ष के दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और दान दिया जाता है। इस दौरान लोग पितरों के नाम पर कौओं को भोजन कराते है। हिंदू धर्म में कौओं को पितरों का दर्जा दिया गया है। पितृ पक्ष हो या कोई भी शुभ कार्य पितरों को याद करते हुए लोग कौओं को भोजन कराते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पितृ पक्ष के दौरान पितर कौओं के रूप में धरती पर आते हैं। शास्त्रों में इस बात का वर्णन किया गया है कि देवताओं के साथ ही कौए ने भी अमृत को चखा था। जिसके बाद से यह माना जाता है कि कौओं की मौत कभी भी प्राकृतिक रूप से नहीं होती है। कौए बिना थके लंबी दूरी की यात्रा तय कर सकते हैं। ऐसे में किसी भी तरह की आत्मा कौए के शरीर में वास कर सकती है और एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकती है। इन्हीं कारणों के चलते पितृ पक्ष में कौओं को भोजन कराया जाता है। वहीं, धार्मिक मान्याओं के मुताबिक जब किसी व्यक्ति की मौत होती है तो उसका जन्म कौआ योनि में होता है। इस कारण कौओं के जरिए पितरों को भोजन कराया जाता है।
