भागवत कथा में सुनाया श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह प्रसंग, श्रद्धालुओं ने की पुष्पवर्षा


सेलूद। मनुष्य खुद के दुख से नहीं बल्कि दूसरों के सुख को देखकर दुखी है। स्पर्धा तुम में भी लगी है। तुम्हारी स्पर्धा के विषय भौतिक पदार्थ हैं। अगर तुम्हारे पास स्कूटी है तो तुम चाहोगे कि मोटर साइकिल आ जाए। व्यक्ति के पास वस्तु है तो उसका सुख नहीं होता बल्कि पड़ोसी की वस्तु देखकर दुख होता है। इसी की पूर्ति में तुम दिन भर लगे रहते हो। यह विचार आचार्य श्रीकांत त्रिपाठी ने बुधवार को बजरंग चौक सेलूद में भागवत कथा सुनाते हुए व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि दुनिया मे सब तरह के लोग होते है जिसमे कुछ लोग उठे हुए को गिरा देते है उसे हैवान कहलाते है। जो उठे हुए को उठाये उसे इंसान कहते हैं और जो गिरे हुए को उठाये उसे भगवान कहते है।
छठवें दिन कथा व्यास से बाल विदुषी शीघ्रता त्रिपाठी ने बतलाया की आपने युक्ति सुनी होगी कि दिल से नही दिमाग से काम लिया जाता है। बुद्धि किसी वस्तु का कार्य और कारण जानकर स्वीकार करता है। लेकिन हृदय के स्वीकृति के पीछे कोई तर्क नही होता। भक्ति में विश्वास को सर्वोपरि माना गया है। बिना विश्वास के भक्ति संभव नही है। इसी विश्वास को दृढ़ रखने के लिए ज्ञान होना आवश्यक है। अर्थात बिना विश्वास के प्रीति नही होती और बिना प्रीति के भक्ति नही होती।
कृष्ण-रूखमणी विवाह की कथा सुनाते हुए कहा कि रुक्मणी विदर्भ देश के राजा भीष्म की पुत्री और साक्षात लक्ष्मी जी का अवतार थी। रुक्मणी ने जब देवर्षि नारद के मुख से श्रीकृष्ण के रूप, सौंदर्य एवं गुणों की प्रशंसा सुनी तो उसने मन ही मन श्रीकृष्ण से विवाह करने का निश्चय किया। रुक्मणी का बड़ा भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से शत्रुता रखता था और अपनी बहन का विवाह चेदिनरेश राजा दमघोष के पुत्र शिशुपाल से कराना चाहता था। रुक्मणी को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने एक ब्राह्मण संदेशवाहक द्वारा श्रीकृष्ण के पास अपना परिणय संदेश भिजवाया। तब श्रीकृष्ण विदर्भ देश की नगरी कुंडीनपुर पहुंचे और वहां बारात लेकर आए शिशुपाल व उसके मित्र राजाओं शाल्व, जरासंध, दंतवक्त्र, विदु रथ और पौंडरक को युद्ध में परास्त करके रुक्मणी का उनकी इच्छा से हरण कर लाए। वे द्वारिकापुरी आ ही रहे थे कि उनका मार्ग रुक्मी ने रोक लिया और कृष्ण को युद्ध के लिए ललकारा। तब युद्ध में श्रीकृष्ण व बलराम ने रुक्मी को पराजित करके दंडित किया। तत्पश्चात श्रीकृष्ण ने द्वारिका में अपने संबंधियों के समक्ष रुक्मणी से विवाह किया। श्रद्धालुओं ने भगवान श्रीकृष्ण-रुक्मणी विवाह को एकाग्रता से सुना। श्रीकृष्ण-रुक्मणि का वेश धारण किए बाल कलाकारों पर भारी संख्या में आए श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर स्वागत किया।

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