महापुरूष जीव कल्याण के लिए अपनी योगमाया शक्ति से माया के कार्य करते है-श्रीश्वरी देवी

रोशन सिंह@ उतई ।नगर के दशहरा मैदान बाजार चौक में कृपालु दरबार समिति द्वारा आयोजित आध्यात्मिक दार्शनिक रसमय प्रवचन में आठवे दिन जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज की प्रमुख प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी जी ने महापुरूष और भगवान में अभेद बताते हुए कहा कि महापुरूष और भगवान में कोई भेद नहीं है, क्योंकि जब कोई जीवात्मा परमात्मा को प्राप्त करके महात्मा बन जाता है तो भगवान अपनी सारी शक्ति अपना सारा ज्ञान उस महात्मा को प्रदान कर देते हैं। अतएव जो शक्तियाँ जो ज्ञान भगवान के पास बड़ी सारी शक्ति सारा ज्ञान महापुरूषों के पास। अतएव महापुरूष और भगवान में कोई भेद नहीं। भागवत में भगवान कहते है:-

“आचार्य मा विजानियात् नावमन्येत कर्हिचित ।

आचार्य अर्थात गुरू को मुझे ही जानों मैं तुम्हारे गुरू के रूप मे हुँ। मुझमें और गुरू में अर्थात महापुरूष मे कोई मतभेद मत मानो। इसलिए जैसी भक्ति भगवान के प्रति हो वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति भी होना चाहिए ।

गुरू की भक्ति को श्रेष्ठ बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान तो अपने कानून में बंधे हैं। वो कहते हैं “निर्मल मन जन सो मोडी पावा। लेकिन हमारा मन तो अभी मलिन है, और जब तक ये मन निर्मल नहीं हो जाता हम ईश्वर प्राप्ति नहीं कर सकते। अतः शिष्य अतःकरण (मन) की शुद्धि के पश्चात् वो दिव्य प्रेम दिव्य शक्ति भी गुरू डी प्रदान करता है। अतएव गुरु का स्थान सबसे ऊँचा माना गया हैं।

मायातीत महापुरूषों के मायापूर्ण कार्यो का रहस्य बताते हुए उन्होंने कहा कि महापुरूष जीव कल्याण के लिए अपनी योगमाया शक्ति से माया के कार्य करते है। भीतर से तो परम् विरक्त होते हैं। किन्तु बाहर से वो केवल एक्टिंग में माया के कार्य करते हैं। जैसे फिल्मों में कलाकार अनेक प्रकार के किरदार निभाते हुए भीतर से भी अपने आप को नहीं भुलते ऐसे डी महापुरूष भी अपनी पर्सनालिटी में रहते हुए बाहर से माया के कार्यों की केवल एक्टिंग करते हैं। इसलिए हमें महापुरूष को पहचानना चाहिए। जैसे ध्रुव प्रहलाद, अम्बरीष पृथु ने भगवत् प्राप्ति के पश्चात् भी करोड़ो वर्षो राज्य किया माया के कार्य भी किये।

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