पाटन. छत्तीसगढ़ में प्राचीन काल से अक्षय तृतीया के दिन मिट्टी के पुतरा-पुतरी का विवाह कराने की परंपरा है.छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि में रचे-बसे पुतरा-पुतरी के विवाह का विशेष महत्व है. लेकिन बदलते समय और दौर के हिसाब से अब ये आधुनिकता की परिभाषा में गुड्डे-गुड़ियों की शादी के नाम से मशहूर हो गया है, तो जाहिर की समय के साथ इसमें आधुनिकता का समावेश भी होना लाजिमी है.

गांव के बैगा द्वारा ठाकुर देव की पूजा अर्चना की गई। किसानों द्वारा ठाकुर देव में दोना में धान, फूल, पैसा चढ़ाकर अच्छी फसल की कामना किये।
गौरतलब है कि अक्षय तृतीया का सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में भी विशेष महत्व है. मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखंड, वाहन आदि की खरीदारी से संबंधित कार्य किए जा सकते हैं. वहीं इसी दिन छोटे बच्चे भी गुड्डे-गुड़ियों का विवाह कर खुशियां बटोरते हैं.
कोरोना वायरस संक्रमण के वजह से लॉकडाउन के कारण इस बार बच्चो ने शासन के दिशा निर्देशों का पालन करते हुए अक्ति त्योहार पर बच्चों ने शादी का मंडप भी सजाया। विवाह के सारे रस्म, हल्दी, चुलमाटी, तेल, मायन सब किए।
