पक्षी विशेषज्ञों ने खोजा खैरागढ़ क्षेत्र में इजिप्शियन वल्चर (सफेद गिद्ध)


दुर्ग भिलाई(न्यूज24 कैरेट/सतीश पारख) पक्षी विशेषज्ञों शरित शेखर बर्मन , लेक्चरर, बायोकेमिस्ट्री विभाग, मैत्री कालेज आफ डेंट्रिस्ट्री एंड रिसर्च सेंटर, अंजोरा और ईश्वरकुमार पटेल, चार्जमैन कम सिनियर टेक्नीशियन, मर्चेंट मिल, भिलाई इस्पात संयंत्र ने दुनिया भर से विलुप्त हो रही सफेद गिद्ध को खैरागढ़ क्षेत्र में ढूंढ निकाला है।उन्होंने न केवल गिद्धों को ढूंढ निकाला बल्कि गिद्धों के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी भी एकत्र की है ।
यह कार्य उन्होंने छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पक्षी विशेषज्ञ श्री ए एम के भरोस , रायपुर के मार्गदर्शन में किया । उनके लिखे आर्टिकल को नेशनल केव रिसर्च एंड प्रोटेक्शन, इंडिया ने अपने एंबिएंट साइंस जर्नल में प्रकाशित किया है ।
इस जानकारी को साझा करते हुए पक्षी विशेषज्ञों ने बताया कि गिद्ध को आहार शृंखला के सर्वोच्च स्थान पर आंका गया है। 90 के दशक में लगभग 40 लाख गिद्ध भारत में थे जो कि 12 लाख टन मांस को वार्षिक दर से समाप्त किया करते थे और अभी 4 – 5 हजार ही बचें हैं ।
गिद्ध एक मृतोपजीवी पक्षी है जिसका पाचनतंत्र मजबूत होता है यही वजह है कि वह रोगाणुओं से परिपूर्ण सड़ा गला मांस भी पचा जाते हैं और संक्रामक रोगों का विस्तार रोकते हैं। इनके न होने से जंगल में पशु-पक्षियों में विभिन्न् संक्रामक रोग फैलने का खतरा रहता है।
सभी जीव एक दूसरे से खाद्य शृंखला द्वारा संबंधित हैं। इनमें से किसी एक का विलुप्त हो जाना, पूरी पारिस्थितिकी को प्रभावित करता है।
गिद्धों की विलुप्ति की मुख्य वजह पशुओं के दर्द नाशक ‘डिक्लोफेनाक’ नामक दवाई है।ये दवा इन गिद्धों के लिए मौत की वजह बन रही हैं। हालांकि इस दवा पर शासन ने बैन लगा दिया है ।उनका कहना है कि गिद्धों की विलुप्ति पर्यावरण संतुलन के लिए भी घातक है.
इस बीच अच्छी खबर है कि छत्तीसगढ़ में गिद्धों की संख्या बढ़ रही है
साल 2005 में गिद्धों की तबाही के बाद की बात है, हम भाग्यशाली थे
11 सफेद गिद्ध देखे गए, मुर्गी के कचरे को खाते हुए, बेरला ब्लॉक ,दुर्ग जिला, में। गिद्धों की इस झुंड में वयस्क और किशोर शामिल थे। किशोरों की उपस्थिति से
उत्सुकता बढ़ी और तब से हम उनकी तलाश कर रहे थे उस स्थान पर और उसके आस-पास घोंसले ।
बाद की यात्राओं में नियमित रूप से अलग-अलग संख्या में देखा जाता था।
प्रजातियों की सघनता दुर्ग, राजनांदगांव में है,कबीरधाम, रायपुर, बलौदाबाजार, कोरिया और बिलासपुर
जिले में इस प्रजाति को देखा गया है।

खोज जारी थी और वर्ष 2015 में, हमने
रायपुर में पावर ट्रांसमिशन टावरों पर देखे 15 घोंसले, लेकिन करीब से देखने पर पता चला कि ये घोंसले
चील के थे।
हमारी टीम ने मार्च 2021 में राजनांदगांव जिले के कुछ हिस्सों का दौरा किया,उद्देश्य था पक्षियों को निहारना। हमारी टीम में शामिल थे पक्षी विशेषज्ञ अखिलेश भरोस, कान्हा किसली , जागेश्वर वर्मा, रायपुर और अनूप नायक, भिलाई ।खैरागढ़ से कुछ किमी पूर्व एक गांव में हमने एक घोंसला देखा ,मुख्य सड़क से कुछ दूरी पर, खेत पर स्थित पावर ट्रांसमिशन टावर पर । खेत के मालिक लखनलाल साहू ने एक छोटा सा घर बनाया है । हमारी यात्रा के उद्देश्य को जानने के बाद उन्होंने परिसर में हमारे प्रवेश की अनुमति दी । जल्द ही टावर के पास पहुँचने पर हमने जमीन से 15 मीटर की ऊंचाई पर बना एक घोंसला देखा। खेत के मालिक ने बताया कि घोंसला पिछले 3 से 4 वर्षों से इस टावर पर विद्यमान है और हर साल चील द्वारा घोंसला बनाया जाता है। दो वर्षों पहले एक व्यक्ति को घोंसले से अंडे चुराते पकड़ा गया था,काले जादू के उद्देश्य के लिए, तब से किसी की प्रवेश
की उनके द्वारा जाँच की जाती है और किसी को भी प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। जल्द ही हमने एक सफेद गिद्ध को घोंसले के करीब पहुंचते और उतरते हुए देखा। हमने खेत मालिक को बताया कि यह चील नहीं गिद्ध है तो वह हैरान रह गए और उन्होंने हमसे संपर्क बनाए रखा और समय-समय पर जानकारी भी एकत्र की।
कोविड-19 महामारी के कारण लॉकडाउन लागू होने के कारण
साइट का दौरा किया गया 29
और 30 मई 2021को । इस समय तक, चूजा बड़ा हो गया था। 30 जून 2021 को देखा गया कि गिद्ध घोंसला छोड़ कर जा चुके थे
21 फरवरी 2022 को साइट का पुनरीक्षण किया गया और एक गिद्ध
टावर पर पाया गया उनमें से एक घोसले के अंदर था । हमारे अध्ययन का विषय था ,एक ही स्थान पर बार-बार घोंसले बनाने की पुष्टि करना और उसका उपयोग करना ,साल दर साल वही घोंसला ।

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