बड़ा खुलासा: छुरा वन परिक्षेत्र के जंगल की तबाही का खौफनाक मंजर,धृतराष्ट्र की तरह जंगलों का उजाड़ कर रहा है वन विभाग, ठससनबाज डीएफओ साहब को है स्टेट्स की चिंता, एसी रूम से बाहर झांकने की नही है फुर्सत…

परमेश्वर कुमार साहू,गरियाबंद

वनों की सुरक्षा के लिए जिन अधिकारी और कर्मचारियों को अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है वही हरे भरे वनों के भक्षक बन जंगल को बेच खा गए।एक तरफ सिमटते जंगल और लगातार पेड़ो की कटाई और अतिक्रमण पर्यावरण के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है।तो दूसरी ओर खड़े जंगल और घने हरे भरे पेड़ पौधों में स्थित जमीन पर ही नियमो के विपरित पहले वनाधिकार पट्टा वन विभाग द्वारा दे दिया गया और अब उस जमीन पर बिना फसल बुवाई के जिम्मेदार विभागीय कर्मचारी द्वारा कुर्सी में बैठे बैठे फर्जी गिदावारी कर शासन को लाखो रूपए का नुकसान पहुंचा दिया।

मामला गरियाबंद जिला के छुरा वन परिक्षेत्र अंतर्गत भैरा और अमलोर बीट का है।जन्हा वन विभाग के लापरवाह और जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों ने चंद रुपयों की लालच में अपने दायित्वों और सारे नियम कायदा कानून को ताक में रखकर हरे भरे जंगल के सैकड़ों एकड़ से अधिक जमीन पर वनाधिकार पट्टा बांट दिया।जबकि उस जमीन पर न तो कोई खेती होता है और न ही आज तक कोई हल चला है।आज भी इस जमीन पर हजारों हरे भरे पेड़ और घना जंगल मौजूद है।जिसमे वनाधिकार पट्टा वितरण में जिम्मेदारों द्वारा बड़ा फर्जीवाड़ा किया गया है।भैरा और अमलोर के 165 कंपार्टमेंट के जंगल में विभाग द्वारा वनाधिकार पट्टा वितरण कर सारे नियमो की धज्जियां उड़ा डाला।

वन विभाग धृतराष्ट्र की तरह खुद जंगलों की उजाड़ में लगे है।वनाधिकार पट्टा के नाम पर जिस तरह से अवैध कब्जा और हरे भरे पेड़ पौधों को बेदम कटाई हुई है वो किसी से नहीं छिपा है। प्रशासन की लचर व्यवस्था जंगल की बर्बादी का कारण बनते जा रहा है।जिसके कारण वन्य प्राणी रिहायसी इलाको की ओर रुख कर रहा है और मानव के गाल में समा रहा है।जंगल की विनाश की योजना देखकर आप भी शर्मसार हो जायेंगे लेकिन इन बेलगाम लापरवाह जिम्मेदार अधिकारियों को पर्यावरण और वनों के प्रति को चिंता नही है।जिसके कारण पहले वनाधिकार पट्टा पावों फिर जंगलों को बाद में काटकर खेत बनाओ की नीति गरियाबंद जिले के छुरा वन परिक्षेत्र सहित अन्य परिक्षेत्र में खूब फल फूल रहा है।

जानिए क्या है गिरदावरी

खेतों में किसानों द्वारा कई प्रकार की फसलें लगाई जाती हैं। इन्हीं फसलों के आधार पर उन्हें कई योजनाओं का लाभ मिलता है। गिरदावरी में राजस्व विभाग, कृषि सहित वनाधिकार पट्टा जो वन विभाग द्वारा दिया गया है उससे संबंधित अधिकारी खेत खलिहान में जाकर लगी फसलों का सत्यापन करते हैं, और उसका रिकार्ड तैयार करते हैं। इसे ही गिरदावरी कहा जाता है। इसी रिकार्ड के आधार पर किसानों को धान खरीदी, मक्का खरीदी, क्षतिपूर्ति, बीमा, प्रोत्साहन राशि, अनुदान, सहायता आदि का लाभ दिया जाता है।

भैरा और अमलोर बिट में जिम्मेदार बिटगार्ड द्वारा फर्जी गिदावरी कर शासन को पहुंचाया लाखो का चूना

आपको बता दे की छुरा वन परिक्षेत्र के इस बीट में जिम्मेदार वनरक्षक दुलार सिन्हा शासन के सारे कायदा कानून को रखकर फर्जी गिदावरी किया गया है।जबकि किसान न तो फसल बुवाई किए है और न ही अपने वनाधिकर प्राप्त पट्टा जमीन पर किसी प्रकार का हल नही चलाए है।जबकि उस जमीन के नाम पर बकायदा फसल, धान खरीदी केन्द्र द्वारा खरीदी किया गया है और किसान द्वारा धान बेचा गया है।खड़े जंगल में ठसनबाज बिटगार्ड द्वारा किसान से मिलीभगत कर घर बैठे ही गिदावरी कर शासन को लाखो की क्षति पहुंचाए है।जबकि शासन प्रशासन द्वारा इस संबंध में स्पस्ष्ट निर्देश दिया गया है की संबंधित अधिकारी कर्मचारी अगर फर्जी गिदावरी करता है तो उनकी जिम्मेदारी है शासन द्वारा फर्जी गिदावरी करने वाले ज़िम्मेदारो पर कार्यवाही के निर्देश दिए थे ।लेकिन परीक्षेत्र के इस बीट में जिम्मेदारो द्वारा जानबूझकर शासन को आर्थिक क्षति पहुंचाने फर्जी गिदावरी करने का बड़ा खेल खेला गया है।ये वही दुलार सिन्हा है जो वर्तमान में भैरा बीट में पदस्थ है जिनके ऐसे कई कारनामे है जिनसे आम जनता सहित विभाग के आलाधिकारी अनजान है।जिनका भी जल्द खुलासा किया जायेगा। जि़म्मेदार पद पर पदस्थ बिटगार्ड दुलार सिन्हा द्वारा शासन को धोखधड़ी कर वन विभाग को चुना लगाने का एक बड़ा खुलासा जल्द ही किया जायेगा।वही जिले में जिम्मेदार पद पर आसीन डीएफओ साहब को जिन वनों की सुरक्षा का दायित्व मिला है उसे शासन के कार्यों के प्रति कोई सरोकार नहीं है।एक जगह कई सालो से जमे वनमण्डलाधिकारी मयंक अग्रवाल केवल एसी रूम में बैठकर केवल कुर्सी की शोभा बस बढ़ा रहे है।जबकि हकीकत यही है की इन्होंने कभी भी एसी रूम से बाहर आकर जंगल की ओर झांकने की जरूरत नहीं समझा।क्योंकि साहब को जंगल और जंगली जानवरों सहित शासन की कार्यों की प्रति कोई सरोकार नहीं है।क्योंकि साहब की केवल ठसनबाजी है जो अगर दफ्तर से बाहर निकल कर काम करे तो उनके स्टेट्स को प्रभाववित करेगा।आखिर साहब भी भी बड़े ओहदे पद पर और पहुंच वाले है।अब देखना ये होगा की खबर के बाद जि़म्मेदार उच्च अधिकारी अपने लापरवाह कर्मचारियों पर क्या कार्यवाही करते है या फिर पहले की भांति उन्हें बचाने का प्रयास ,ये सबसे बड़ा सवाल है।

वही इस मामले को को लेकर छुरा रेंजर एसडी दीवान और डीएफओ मयंक अग्रवाल को उनका पक्ष जानने फोन किया गया लेकिन उन्होंने हमेशा की भांति फोन उठना जरूरी नहीं समझा।

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