लोकेश्वर सिन्हा
राजिम गरियबन्द गरियबन्द जिले के राजिम तहसील मुख्यालय में सोढूर, पैरी एवं महानदी त्रिवेणी संगम के मध्य मेें स्थित भगवान श्री कुलेश्वरनाथ महादेव के स्थापना त्रेतायुग में महाराज दशरथ के पुत्र वधु माता सीता ने अपने हाथों से किया था। कीवदंति है कि वनवास काल के दौरान श्रीराम, लक्ष्मण एवं माता सीता रामायण काल के यह तीनो मूर्ति समय का सद्पयोग करते हुए दक्षिण कौशल में उपस्थित असुरी शक्तियो का नाश किया। नदी मार्ग से चलते हुए महर्षि लोमष से मिलने त्रिवेणी संगम के तट पर पहुचे तथा चौमासा यही व्यतीत किया। इस दौरान नदी में स्नान कर माता सीता अपने कुल की आराध्य देव की अराधना के लिए रेत से अपने हाथो के द्वारा शिवलिंग का निर्माण किया। पश्चात जलाभिषेक किया। इससे जल की धारा पांच ओर से फुटकर बह गया और उसी दिन से इनका नाम पंचमुखी पड़ गया। रामचंद्र ने रामेश्वरम् में शिवलिंग की स्थापना की है, तो माता सीता ने राजिम में श्री कुलेश्वरनाथ महादेव का निर्माण किया है। जानकारी के मुताबिक एक अंतराल के बाद यहां मंदिर का क्रम शुरू हुआ। उस समय बाढ़ आने के कारण हर बार बह जाता था। एक जमींदार ने चबूतरा बनाने की ठान ली और हर बार वह बह जाता इससे उन्हें बहुत दुख हुआ। अचानक एक दिन त्रिवेणी संगम में ही उन्हें साधु मिला तब अपना सारा दुखड़ा सुनाया। साधु ने एक चिमटा प्रदान किया और कहा कि इसे ले जाकर जहां तुम चबुतरा बना रहे हो उसी स्थान पर गड़ा देना। जमींदार ने ऐसा ही किया और देखते ही देखते 17 फुट की ऊंची जगती तल का निर्माण हो गया। महादेव का यह मंदिर सातवीं शताब्दी का माना गया है। गर्भगृह मे श्री कुलेश्वरनाथ महादेव का शिवलिंग है नीचे वेदी पर मां पार्वती है। अतः अर्धनारीश्वर के रूप में भक्तगण अराधना करते है। महामंडप पर मां काली, श्याम कार्तिकेय, मां शीतला, भैरव बाबा, शनिदेव, की मूर्तियां भित्ती में स्थापित है। सामने नंदी महाराज पालथी मारकर बैठे हुए है। इससे लगा हुआ एक और गर्भगृह है। बताया जाता है कि इन्हें बाद में बनाया गया है। इसमें मां दुर्गा की मूर्ति विराजमान है इनके संबंध में कहा जाता है कि यह मूर्ति नदी की रेत में बहते हुए मिली थी, जिसे किसी श्रद्धालु ने लाकर यहां प्रतिष्ठित कर दिया। चबुतरे पर करीब 600 साल पुरानी पीपल का वृक्ष है, जो मंदिर की सुदंरता पर चार चांद लगाये हुए है। इस विशाल वृक्ष के नीचे मां गंगा, गणेशजी, हनुमानजी की मूर्तियां है। मंदिर में चढ़ने व उतरने के लिए तीन ओर से सीढ़िया है जिनमें प्रथम पूर्वाभिमुख, व्दितीय उत्तराभिमुख एवं तृतीय कम चैड़ाई के सीढ़ी दक्षिण दिशा में है। कहते है कि श्रद्धालुगण शिवलिंग की पूजा अर्चना करने के बाद अक्षत, द्रव्य, फूल पत्तियां, दूध, दही आदि सामग्री अंदर से ही नदी मिल जाते थे। परन्तु बाद में कुछ लोगों ने इन्हे बंद कर दिया। छिद्र के बंद होने से अब ऊॅ की ध्वनि सुनाई नही देती। महादेव की दो बार वैदिक विधि से पूजा अर्चना की जाती है शिव आरती में घंटियो की झंकार एवं डमरू की आवाज माहौल को भक्ति रस में घोल देती है। उल्लेखनीय है कि पूरी दुनिया में 275 पवित्र शिव पीठो का उल्लेख मिलता है। व्दादश ज्योतिलिंग है तथा 108 पवित्र शिवलिंगो की गिनती होती है, जिस इन शिवपीठो की मान्यता है उसी प्रकार श्री कुलेश्वरनाथ की भक्ति में भक्तगण हमेशा रमें रहते है। माघी पुन्नी मेला के स्नान के साथ ही शिवलिंग के दर्शनकर श्रद्धालुगण अपने आप को पवित्र मानते है।
