शैलेन्द्र ठाकुर@दंतेवाड़ा। दो लहरों का संक्रमण थमने के बाद स्कूल खुले भी तो प्रायमरी स्कूलों के लिए पहली कक्षा में दाखिले के लिए बच्चों को तलाशना मुश्किल हो गया, क्योंकि लॉक डाउन के वक्त से आंगनबाड़ी केंद्र भी लंबे समय तक बंद रखे गए थे, जहां से पहली कक्षा से पहले के लिए बच्चों को तैयार किया जाता है। लॉक डाउन और ऑनलाइन पढ़ाई के बीच दक्षिण बस्तर में बच्चों की पढ़ाई और शिक्षा के स्तर पर सीएमएसआर यूनिसेफ मीडिया फेलोशिप के लिए यह रिपोर्ट…
सामाजिक दुष्प्रभाव
ऑनलाइन कक्षाओं के सामाजिक दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। घंटों मोबाइल से चिपके बच्चे अब परिवार और अपने गांव के दूसरे लोगों से दूरी बनाते दिख रहे हैं, जिसका असर उनकी दैनिक व सामाजिक गतिविधियों पर भी पड़ा है।
आर्थिक व भौगोलिक विषमता ने बढ़ाई मुश्किलें
दंतेवाड़ा जिले में भौगोलिक विषमता के चलते बसाहट सघन नहीं हैं। एक से दूसरे मोहल्ले की दूरी एक किमी से लेकर 5 किमी तक की भी होती है। साथ ही नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से अंदरूनी गांवों तक सड़क व बिजली की सुविधा तक नहीं हैं, जहां मोबाइल को चार्ज करना भी मुश्किल है। शिक्षा व आर्थिक स्तर कमजोर होने और जागरूकता की कमी के चलते पालक अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति उतने गंभीर नहीं दिखते हैं। इस वजह से ऑनलाइन कक्षाओं से इन गांवों के बच्चों को जोड़ना एक दुष्कर कार्य है।
करीब 48 हजार बच्चे पढ़ रहे
जिले में प्रायमरी, मिडिल, हाई व हायर सेकेंड्री स्तर के कुल 885 सरकारी स्कूल हैं, जिनमें पहली से 12 वीं तक 42 हजार बच्चे अध्ययनरत हैं। इसके अलावा निजी व केंद्र सरकार द्वारा संचालित कुल 32 स्कूलों में 6 हजार से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
फैक्ट फाइल
जिला दंतेवाड़ा
क्षेत्रफल-3410.50 वर्ग किमी
जनसंख्या – 2,83,479
कुल गांव – 239, कुल ग्राम पंचायतें 143
तहसील-5
विकासखंड-4
पालकों व विशेषज्ञों के अभिमत
ऑनलाइन से ज्यादा मोहल्ला क्लास प्रभावी
भौगोलिक विषमता व पहुंचविहीन इलाको में साधन नहीं होने के चलते ऑनलाइन क्लास में काफी दिक्कतें आती हैं, लिहाजा लॉक डाउन के दौरान अपनाई गई मोहल्ला क्लास की रणनीति को फिर से अपनाने पर विचार कर रहे हैं। सबसे ज्यादा समस्या कटेकल्याण व कुआकोंडा ब्लॉक में हैं, जहां अधिकांश इलाके में मोबाइल कनेक्टिविटी की समस्या है। ऐसी जगहों पर पिछले लॉक डाउन के दौरान मोहल्ला क्लास चलाए गए थे, जो काफी सफल रहे थे।
-राजेश कर्मा, जिला शिक्षा अधिकारी, दंतेवाड़ा
सामान्य कक्षाएं ही बेहतर
सामान्य कक्षाओं में ही बच्चे अच्छी तरह सीख सकते हैं। ऑनलाइन कक्षाओं से इसका मुकाबला नहीं किया जा सकता है। चूंकि कोरोना संक्रमण का खतरा था, इसलिए बच्चों को स्कूल नहीं भेजने का फैसला सरकार ने जनता की भलाई के लिए लिया था, इसलिए इसका कोई विरोध नहीं है, लेकिन अगर लंबे समय तक ऐसा ही चलता रहा तो, बच्चों की पढ़ाई फिर से पटरी पर आने में काफी मुश्किलें आएंगी।
श्रीमती तूलिका ठाकुर (अभिभावक)
ऑनलाइन पढ़ाई पूरी तरह गलत नहीं, सुधार की जरूरत
पिछले कोविड लॉक डाउनकाल में जितनी अपेक्षा शिक्षक और बच्चों से की गई थी, वो पूरी नहीं हुई। अपेक्षित सफलता नहीं मिली। ग्रामीण स्तर पर सामान्य स्कूल और आवासीय स्कूल काफी प्रभावित हुए । लेकिन कहते हैं न .. जहाँ चाह वहाँ राह ।। ऐसा नहीं है कि ऑनलाइन पढ़ाई सही नहीं है, इसमें हम सामान्य दिनों की तरह कम से कम 80 से 90 बच्चों तक पहुंचने में कैसे सफल हो सकते हैं, यह सोचना है। कुछ जागरूक शिक्षक साथी हैं, जिन्होंने सराहनीय प्रयास भी किया था लेकिन सफलता से कुछ कदम पीछे रह गए। समय रहते ऐसी पहल करने की आवश्यकता है। समय के साथ बदलाव आवश्यक है और हमें पुनः सही तरीक़े से तकनीक का उपयोग सीखना है । तात्पर्य यह है कि इस बार जो शिक्षक बच्चों के सीखने पर सही काम कर रहे हैं वे आने वाले समय में अपने क्षेत्र के कम से कम 10 शिक्षक साथियों को चिन्हित करें और उनके साथ मिल कर कार्य करें ।। सही टीम वर्क करें तो बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार की महती योजना नवा जतन पठन कौशल और गणितीय कौशल विकास पर सही पहल की आवश्यकता है।
– मोहन लाल खरे, शिक्षक व मिशन लक्ष्यवेध के समन्वयक
ऑनलाइन पढ़ाई के साइड इफेक्ट ज्यादा
ऑनलाइन शिक्षा के फायदे से ज्यादा साइड इफेक्ट हैं। इसमें बच्चों और शिक्षक के बीच में रिश्ता नही बन पाता है। बच्चे एक दूसरे से नहीं मिल पाते हैं तो एक दूसरे से सीखने का स्कोप खत्म हो जाता है। मोबाइल मिलते ही बच्चे हिंसक खेल खेलते हैं, जिससे बच्चों में लड़ाई-झगडे की भावना पैदा होती है। ऑनलाइन पढ़ाई का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह भी है कि बच्चे पढ़ाई के नाम पर मोबाइल में अन्य चीज़ों में भी उलझ जाते हैं, जो कि अभी उनकी उम्र के हिसाब से उनके लिए उपयोगी नहीं है।
-करण कबीर ( दक्षिण बस्तर में लंबे समय से कायर्रत संस्था ‘बचपन बनाओ’ के सदस्य)
