प्रवचन का चतुर्थ दिवस,,,,,,
श्रद्धालुओ ने भगवान के भजन में मंत्र मुग्ध होकर किया नृत्य,,
पाटन—राधे कृष्ण प्रचार समिति एवँ नगर वासियो के तत्वाधान में गोपेकेश्वरी देवी ने प्रवचन के चतुर्थ दिन प्रवचन श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए देवी जी ने बताया कि भगवान को जानना केवल उनकी कृपा से ही संभव है । अर्थात् वो भगवान जिस जीव पर अपनी कृपा कर दे वही उनको जान सकता है । फिर एक प्रश्न आया कि यदि भगवान की कृपा से ही हम भगवान को जानेंगे तो हम जीवों पर अब तक भगवान की कृपा क्यों नही हुई ? अनन्त संतों पर भगवान की कृपा हो गई , उन्होंने भगवान को जान लिया और हम जीव अभी तक उनकी कृपा से वंचित है ,क्यों ? तो इसका उत्तर देते हुए देवी जी ने बताया कि भगवान की कृपा को पाने की एक शर्त है, और वो है शरणागति अर्थात् हमें भगवान की शरण में जाना होगा उनकी कृपा को पाने के लिए । और ये शरणागति का अर्थ है की जीव को कुछ नहीं करना बस भोले बालक की तरह भगवान की शरण में जाना है, तभी भगवान जीव का योगक्षेम वहन करेंगे यानी जीव के समस्त कर्मों के कर्ता, संचालक भगवान बन जायेंगे । जैसे महाभारत युद्ध के समय अर्जुन भगवान की शरण में गया तब भगवान ने उसका योगक्षेम वहन किया । ऐसे ही शरणागति जीव को करनी है । आगे देवी जी ने बताया कि मन और बुद्धि का समर्पण भगवान के चरणों में करना होगा, इंद्रियों का नहीं क्योंकि भगवान मन के भाव देखते हैं शरीर से जीव क्या कर रहा है,भगवान इस पर ध्यान नहीं देते । और कुछ न करने का अर्थ समझाते हुए देवी जी ने बताया कि कुछ न करने का अर्थ है की हम संसार में रहकर बाहर से अपने समस्त कर्तव्यों को निभाएं लेकिन मन से भगवान से प्यार करें यानी
‘ तन कार में मन यार में ‘। लेकिन फिर प्रश्न आया की एक मन है और वो संसार में लग गया है, संसार को समर्पित है, संसार को अपना मानता है फिर भगवान को समर्पित हो कैसे ? तो इसके विषय में कल प्रवचन में बताया जाएगा ।
