कोहका में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा पुराण के चौथे दिवस ध्रुव चरित्र, राजा पृथु उपख्यान,अजामिल व वृत्रासुर कथा व प्रहलाद चरित्र कथा का व्याख्यान किया गया

भिलाई। मंगल बाजार ग्राउंड हनुमान मंदिर के पास कोहका में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा पुराण के चौथे दिवस ध्रुव चरित्र, राजा पृथु उपख्यान, प्रियव्रत चरित्र, अजामिल व वृत्रासुर कथा व प्रहलाद चरित्र कथा का व्याख्यान किया गया। जिसमें व्यास पीठ से पंडित मिथिलेश पांडेय ने श्रोताओं को बताया कि राजा उत्तानपाद की सुनीति पहली पत्नी थी, जिसका पुत्र ध्रुव था सुनीति बड़ी रानी थी, लेकिन राजा सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र को ज्यादा प्रेम करता था तभी वहां सुरुचि आ गई अपनी सौतन के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसके मन में जलन होने लगी, तब उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बैठाते हुए कहा राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है और राज सिंहासन का भी अधिकारी हो सकता है, जो मेरे गर्भ से जन्मा हो, तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है । यदि तेरी इच्छा राजसिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा, तभी सिहांसन प्राप्त कर पाएगा।
पांच साल का अबोध बालक ध्रुव सहम कर रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास गया और उसने अपनी मां से उसके साथ हुए व्यवहार के बारे में बताया। मां ने कहा बेटा सुरुचि तेरी सौतेली मां है तेरे पिता उससे अधिक प्रेम करते हैं इसी कारण वह हम दोनों से दूर हो गए हैं। अब हमें कोई सहारा नहीं रह गया है। हमारे सहारा तो जगतपति नारायण ही है। नारायण के अतिरिक्त अब हमारे दुख को दूर करने वाला कोई दूसरा बचा नहीं है। इस बात को सुनकर बालक ध्रुव ने भगवान नारायण की तपस्या करने जंगल की ओर रवाना हो गए।
बालक ध्रुव जो भगवान विष्णु का परम भक्त था। बालक ध्रुव के मन पर दोनों ही मां सुनीति व सुरुचि के व्यवहार का बहुत गहरा असर हुआ। और वह एक दिन घर छोड़कर चला गया। रास्ते में उसे नारद जी मिले नारद मुनि ने उससे कहा बेटा तुम घर जाओ तुम्हारे माता-पिता चिंता करते होंगे। लेकिन बालक ध्रुव नहीं माना और कहा कि मैं नारायण की भक्ति करने जा रहा हूं तब नारद मुनि ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा दी । वह बालक यमुना नदी के तट पर मधुबन में इस मंत्र का जाप करने लगा। फिर नारद मुनि ने उसके पिता उत्तानपाद के पास गए तो उत्तानपाद ने कहा कि मैंने एक स्त्री के वश में आकर अपने बालक को घर छोड़कर जाने दिया मुझे इसका बहुत मलाल है, फिर नारद जी ने कहा कि अब आप उस बालक की चिंता ना करें उसका रखवाला तो अब भगवान नारायण स्वयं हैं। भविष्य में उसकी कृति चारों ओर फैलेगी।
उधर बालक की कठोर तपस्या से अत्यंत ही अल्पकाल में भगवान नारायण प्रसन्न हो गए और उन्होंने दर्शन देकर कहा हे बालक मैं तेरे अंतर्मन की व्यथा और इच्छा को जानता हूं तेरी सभी इच्छाएं पूर्ण होगी। भक्त ध्रुव को परम पद की प्राप्ति हुई, जिसका चरित्र तीनों लोक में विख्यात है। इसलिए प्रभु भक्ति में लीन हो जाना चाहिए।

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