राज्य़ सरकार गरियाबंद आदिवासी जिले की कर रही उपेक्षा- चंद्रशेखर साहू। समय पर सही रिपोर्ट भेजने पर आकांक्षी जिला में होता शामिल।

लोकेश्वर सिन्हा

गरियाबंद —कोरोनाकाल में शहरी क्षेत्र के साथ ही ग्रामीण अंचल के पत्रकारों ने भी खबरों को लेकर अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी से निभाया है। संक्रमण के इस दौर में समस्त़ पत्रकारों ने फ्रंटलाइन कोरोना वारियर्स की भूमिका निभाई है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ पत्रकारों को माना गया है। पत्रकारों ने संक्रमण के इस दौर में इससे बचाव एवं रोकथाम को लेकर खबरों के माध्यम़ से जनजागरूकता फैलाने का काम करते हुए विभिन्ऩ समस्याओं से भी शासन-प्रशासन को अवगत कराने का कार्य किए हैं। उक्त़ बातें पूर्व कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू ने जिला मुख्यालय स्थित सर्किट हाउस में आयोजित पत्रकारों के सम्मान समारोह के दौरान कही है।
उन्होंने संक्रमण काल में जिला मुख्यालय के पत्रकारों के कार्यों को सराहते उन्हें साल, श्रीफल भेंटकर सम्मान किया। श्री साहू ने कहा कि महानगर एवं राजधानी के पत्रकार जो कार्य नहीं कर पाते वह कार्य ग्रामीण अंचल के पत्रकार फील्ड़ में रहकर खबरों को प्रमुखता से उठाते हुए शासन-प्रशासन सहित जनता तक पहुंचाते हैं। भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से पत्रकारों को फ्रंटलाइन का दर्जा देने की मांग की थी। जिससे कि प्रेस की भूमिका सशक्त़ और सक्षम हो।
श्री साहू ने पत्रकारों को संबोधित करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में पहले कुल 44 प्रतिशत वनक्षेत्र थे, जो कि आज कांग्रेस शासनकाल में सिमटकर 40 प्रतिशत हो गया है। जिसका प्रमुख कारण वन विभाग की उदासीनता के चलते वनों की अवैध कटाई है, जिससे कि जंगल अब मैदानों में तब्दील होते जा रही है। गरियाबंद आदिवासी जिला है, जहां वन विभाग में तीन साल से वर्किंग प्लान बंद पड़ी है, जिससे राजस्व़ की क्षति हो रही है, इसके साथ ही वन क्षेत्र के लोगों को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। वहीं जिले का आबंटन कम कर दिया गया है, जिससे कि विकास की गति धीमी हो गई है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार ने देश के कुल 118 जिलों को आकांक्षी जिला में शामिल किया है। यदि प्रदेश सरकार समय रहते गरियाबंद जिले की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सही रूप से भेजते तो आज गरियाबंद आदिवासी जिला को आकांक्षी जिला के माध्यम़ से पर्याप्त़ बजट मिलता, जिससे आदिवासी जिले में विकास की गंगा बहती और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को पर्याप्त़ रोजगार मुहैय्या होती। राज्य़ सरकार गरियाबंद आदिवासी जिले की लगातार उपेक्षा कर रही है।
उन्होंने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ में 6 लाख प्रधानमंत्री आवास गरीब परिवारों के बनने थे, जिसमें राज्य़ सरकार की 40 प्रतिशत राशि जमा नहीं करने से केंद्र ने राशि वापस ले ली हैं। जिसके चलते गरीबों के आशियानें आज भी अधर में लटकी हुई है। केंद्र सरकार की महती योजना जल जीवन मिशन के तहत राज्य़ सरकार को साढे 12 हजार करोड़ रूपए में पहले चरण में सात हजार करोड़ रूपए मिला था, जिसमें राज्य़ सरकार ने जल जीवन मिशन की शुरूआत काफी देर से की, यदि समय में कर लेते तो हर घर में शुद्ध पेयजल मुहैय्या हो पाता। राज्य़ सरकार केंद्र की कोई भी योजना को गंभीरता से नहीं लेते हैं। जिसका खामियाजा ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को भुगतना पड़ रहा है।

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