रोपणी नर्सरी झरियाबाहरा मे बांस करील की बेहिचक तोड़ाई… तैनात वन कर्मचारी नदारद


? रिपोर्टर विक्रम कुमार नागेश गरियाबंद ब्यूरो
मैनपुर। करील बनाकर उसे बेचा जाना प्रतिबंधित है, लेकिन वन विभाग की निष्क्रियता के कारण हाट-बाजारों में खुलेआम करील की बिक्री की जा रही है। प्रतिबंध आदेश का पालन जिले में तनिक भी नहीं हो रहा है

पहले जहाँ करील का उपयोग चोरी छिपे किया जाता था अब वहीं इसकी सब्जी हर घर की मिठास बन गई है। जिसके कारण बाजार में भी इस वस्तु की खुलेआम बिक्री होते देखे जा रहे हैं। हालाँकि इसके बिक्री व उपयोग पर वन विभाग ने रोक लगा रखी है लेकिन बिक्री प्रतिबंधित नही हो पा रही है। बांस की नरम कोपलें जिसे प्रारंभिक अवस्था में(कोपेश़) करील कहा जाता है।जो वन विभाग के संरक्षण में आता है तथा वर्तमान समय में ही यह कोपलें बांस की जड़ों से निकलता है इसे तोडऩा या बेचना पूर्ण प्रतिबंधित है। लेकिन इस वस्तु को बाजार में खुलेआम बेंची जा रही है।वन विभाग द्वारा हालाकि इसके क्षति पहुँचाने पर प्रतिबंध तो जरूर लगाया गया है।लेकिन यह प्रतिबंध महज़ कागजों तक ही सीमित होकर रह गया है। क्षेत्र के हाट बाजारों में बीते कुछ वर्षों से बतौर सब्जी करील की बिक्री का कारोबार खुलेआम हो रहा है। जिसकी कीमत इन दिनों 60 से 80 रूपए प्रति किलोग्राम के भाव पर बिक रही है।खुले तौर पर बिकने से इसके खरीददारों की भी संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। ऐसा नही है कि वन अमले को इसकी भनक या जानकारी ना हो अपितु सब कुछ जानते समझते हुए भी विभाग के कारिंदे निष्क्रिय होकर चुप्पी साधे बैठे है।इस प्रकार बांस कोपलों के बढ़ते उपयोग के कारण बांस की घटती संख्या या कहें सिमित होती जा रही है।ध्यान देने वाली बात तो यह है कि बांस बचाने की दिशा में वन अमला को हाट बाजारों में खुलेआमसब्जी के रूप में बिक्री की वस्तु बनी करील पर पूर्णत: पाबंदी लगाकर विभागीय कार्यवाही किया जाना चाहिए।जिससे इसके असमय क्षति पर रोक लगाई जा सके। लेकिन ऐसा नही होने से करील सार्वजनिक वस्तु की चीज बनकर रह गई है। ऐसा ही मामला  वन परिक्षेत्र बफर जोन  तौरेंगा  झरियाबाहरा  वन रोपणी नर्सरी का है जहां विगत कई वर्षों से बांस के पौधे लगाए गए थे जिसकी उपयोगी नहीं होने के कारण यहां के  इन लगाए हुए बांसों की जड़ों से छोटे-छोटे  बांस के नरम कोपलें करील  बेहिचक तोड़ाई की जा रही है जहां करील के छिलके पूरा बिखरे पड़ा हुआ है आपको बता दें कि  झरियाबहारा मे वन अमला कर्मचारी पदस्थ होने के बावजूद भी यह करील तोड़ने वालों पर रोक नहीं लगाई जा रही है जो समझ से परे है वन परिसर के सामने यह हाल है तो जंगलों का क्या हाल होगा समझा जा सकता है।

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