पोला छत्तीसगढ़ के प्रमुख त्योहारों में से एक है। पोला पर्व भादो माह की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। किसानों के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है। वे इस दिन बैलों का साज सज्जा कर पूजा अर्चना कर सुख-शांति की कामना करते हैं। जहां घरों में बैलों की पूजा होती है, वहीं लोग पकवानों का लुत्फ भी उठाते हैं। इसके साथ ही इस दिन ‘बैल दौड़ प्रतियोगिता’ का आयोजन किया जाता है। पोला पर्व पर शहर से लेकर गांव तक धूम रहती है। इस दौरान जगह-जगह बैलों की पूजा-अर्चना की होती है। गांव के किसान भाई सुबह से ही बैलों को नहला-धुला कर सजाते हैं, फिर हर घर में उनकी विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद घरों में बने पकवान भी बैलों को खिलाए जाते हैं।इस दिन मिट्टी और लकड़ी से बने बैल चलाने की भी परंपरा है। पर्व के दो-तीन दिन पूर्व से ही बाजारों में लकड़ी तथा मिट्टी के बैल जोड़ियों में बिकते दिखाई देते हैं।
पोला नाम क्यों पड़ा:-
विष्णु भगवान जब कान्हा के रूप में धरती में आए थे, तब जन्म से ही उनके कंस मामा उनकी जान के दुश्मन बने हुए थे। कान्हा जब छोटे थे और वासुदेव-यशोदा के यहां रहते थे, तब कंस ने कई बार कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था।एक बार कंस ने पोलासुर नामक असुर को भेजा था, इसे भी कृष्ण ने अपनी लीला के चलते मार दिया था, और सबको अचंभित कर दिया था। वह दिन भादों माह की अमावस्या का दिन था, इस दिन से इसे पोला कहा जाने लगा।

कोरोना महामारी के चलते सादगी से मनाया जाएगा
छत्तीसगढ़ के पारंपरिक पर्वों में से एक भाद्रपद अमावस्या को मनाया जाने वाला पोला पर्व इस बार कोरोना महामारी के चलते सादगी से मनाया जाएगा। हर साल बैल दौड़ प्रतियोगिता में आसपास के गांवों से अनेक बैलों का श्रृंगार करके किसान अपने साथ लाते थे और बैलों की दौड़ प्रतियोगिता होती थी। इसे देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटती थी। इस बार बैल दौड़ प्रतियोगिता को कोरोना के चलते स्थगित कर दिया गया है। बैलों की पूजा के बाद बच्चे मिट्टी के बैल दौड़ाएंगे।
