स्वाधीनता दिवस विशेष : यहां के हर गांव में स्वतंत्रता आंदोलन के किस्से और सेनानियों की भागीदारी का इतिहास समेटे हुए

पाटन। दुर्ग जिले का पाटन ब्लॉक, यूं तो यह क्षेत्र राजनीतिक तौर पर बेहद सक्रिय माना जाता है, लेकिन इसकी एक और पहचान है जो समय के साथ लोग भूलते जा रहे हैं। यह आजादी के दीवानों की भूमि है। यहां के हर गांव में स्वतंत्रता आंदोलन के किस्से और सेनानियों की भागीदारी का इतिहास समेटे हुए है। पाटन को सेनानियों का गढ़ कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। महात्मा गांधी खुद इनके बीच पहुंचे थे। यहां के सेनानियों ने देश के दूसरे हिस्सों में भी जाकर आंदोलन का नेतृत्व किया। बापू इन सेनानियों के त्याग-तपस्या से इस तरह अभीभूत हुए, कि उन्होंने कई सेनानियों को अपना सहचर भी बनाया।

पाटन में देवादा के बाद सर्वाधिक सेनानी सेलूद में हुए। इसके अलावा सांतरा, मटंग, पाटन, खोरपा, सुरपा, डंगनिया, खम्हरिया, मर्रा में कई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हुए। आंदोलन का बागडोर संभालने के बाद 87 साल पहले वर्ष 1933 में बापू पहली बार दुर्ग आए। आजादी का अलख जगाने निकले गांधीजी ने पाटन के आजादी के दीवानों में वह जज्बा पैदा किया कि इतिहास के पन्नों ने क्षेत्र का नाम सेनानियों के गढ़ के रूप में दर्ज हो गया। उन्होंने यहां छूआछूत के खिलाफ संदेश भी दिया। असर ये हुआ पाटन के सेनानियों ने नेतृत्व सुरपा के अनु. जाति के सेनानी मोरैय्या को सौंप दिया, जिन्होंने बाद में नागपुर राजधानी में विधायक बन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।
पाटन में देवादा गांव में सर्वाधिक 14 सेनानियों का नाम दर्ज है। इनमें से 6 एक ही परिवार के सदस्य हैं। यहां मालगुजार से लेकर गांव के कोटवार तक सभी ने अपना-अपना योगदान दिया था। यहां के डॉ, महादेव प्रसाद पांडेय को पद्मश्री से नवाजा जा चुका है।
देवादा के रामलाल वर्मा आजादी के आंदोलन में गांधीजी के सहचर बने। वे गांधी के अंतिम समय भी उनके साथ रहे। 30 जनवरी 1948 को प्रार्थना सभा में जब गांधीजी को गोली मारी गई, तब भी वे उनके साथ थी और घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे। कई अन्य भी गांधीजी के संपर्क में रहे।

15 अगस्त 1942 को करो या मरो के नारे के बाद पाटन के रावण भाठा में आमसभा हुई। नेता उदयराम वर्मा ने ऐसा भाषण दिया कि भीड़ उत्साहित हो गई और थाने में कब्जे के लिए कूच किया। घबराकर थानेदार ने हवा में कई गोलियां चलाईं, लेकिन आजादी के दीवानों के कदम नहीं रोक पाए। आखिर इन पर अंग्रेजों ने जमकर कहर बरपाया।
पुर्तगालियों से गोवा मुक्ति के ऐलान के बाद पाटन के कई सेनानियों ने गोवा कूच कर लिया। इनमें डंगनिया के खूबीराम कश्यप भी थे। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के पुत्र जेएस तिलक ने अपनी किताब में उनके योगदान का विशेष उल्लेख किया है। सेनानी के पुत्र बसंत कश्यप बताते हैं कि गोवा मुक्ति के बाद जब वे लौटे तो दुर्ग स्टेशन से उनके घर तक लोगों ने साथ चलकर उनका स्वागत किया।

 15 अगस्त 1940 में अवज्ञा आंदोलन का संदेश पाटन पहुंचा। सेनानी उदयराम, मधुमंगल सावर्णी और दरबार मोखली के गैदलाल बंछोर ने प्रचार का दायित्व संभाला। इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। जेल से छूटे तो गांधी ने अहिंसा आंदोलन और दिल्ली चलो का नारा दे दिया। 15 अप्रैल 1941 को गैंदलाल बंछोर, सत्याग्रही मोतीलाल, तुलाराम व लखनलाल के साथ पैदल ही दिल्ली रवाना हो गए।

देवादा में 14 सेनानियों के नाम पर बनाई गई है स्मृति कुंज
१. द्वारिका प्रसाद दुबे
२. चुगनूराम वर्मा
३. रामाधीन दुबे
४. रामेश्वर वर्मा
५.रामखिलावन दुबे
६.लखनलाल वर्मा
७.बेनीप्रसाद दुबे
८. रामलाल वर्मा
९. छेदीलाल दुबे
१०. असवाराम वर्मा
११. केजऊ कोटवार
१२. दौलतराम साहू
१३. सिरासिंह निर्मल
१४. महादेव पांडेय

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