दुर्ग। मई 2013 को हुए दर्दनाक झीरम घाटी नरसंहार मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जिला कांग्रेस कमेटी दुर्ग (ग्रामीण) जिला अध्यक्ष राकेश ठाकुर, दुर्ग शहर अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल एवं भिलाई नगर अध्यक्ष मुकेश चंद्राकार ने संयुक्त रूप से प्रेस से बात करते हुवे अपनी प्रतिक्रिया साझा की है। कांग्रेस नेताओं ने इस फैसले को “आधा-अधूरा न्याय” करार देते हुए कहा कि अदालत ने एनआईए द्वारा पेश किए गए तथ्यों के आधार पर निर्णय दिया है, लेकिन एनआईए की जांच शुरुआत से ही दिशाहीन और पूर्वाग्रह से ग्रसित रही है।
साजिश के मुख्य पहलुओं को एनआईए ने दरकिनार किया
दूर्ग ग्रामीण कांग्रेस जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर ने कहा कि 25 मई 2013 के इस जघन्य नरसंहार में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व सहित 32 वरिष्ठ नेताओं, जनप्रतिनिधियों, कार्यकर्ताओं और जवानों ने अपनी शहादत दी थी। इस कांड की गहराई से जांच करने के बजाय एनआईए ने इसके राजनीतिक षड़यंत्र के मुख्य पहलुओं को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जिन 10 लोगों को सजा सुनाई गई है, वे केवल छोटे कैडर के नक्सली हैं। इतनी बड़ी घटना बिना शीर्ष नक्सली नेताओं और राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं थी।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष राकेश ठाकुर ने सवाल उठाते हुवे कहा कि एनआईए ने अपनी शुरुआती जांच और एफआईआर में गणपति (मुपल्ला लक्ष्मण राव) और रमन्ना जैसे बड़े नक्सली कमांडरों को नामजद किया था और 21 मार्च 2014 को इनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट भी जारी हुआ था। लेकिन सितंबर 2014 की अंतिम चार्जशीट से इनके नाम रहस्यमयी ढंग से क्यों हटा दिए गए? देवा (बारसे सुक्का), जिस पर भारी इनाम घोषित था, उससे भी एनआईए ने पूछताछ करने की जहमत क्यों नहीं उठाई? मुख्य मास्टरमाइंड चैतू (DKSZC सदस्य), रूपेश उर्फ मोल्ला राजिरड्डी, निर्मला उर्फ सुमित्रा, भूपति उर्फ सोनू दादा और सुजाता जैसे कई इनामी व शीर्ष नक्सलियों ने पुलिस और सुरक्षा बलों के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसके बावजूद एनआईए ने इनसे पूछताछ क्यों नहीं की? परिवर्तन यात्रा की सुरक्षा अचानक क्यों हटाई गई और यात्रा का मार्ग किसने और क्यों बदलवाया? ये सब षड़यंत्र पूर्वक किया गया है। श्री ठाकुर ने आगे कहा कि घटना स्थल पर हफ्तों तक शहीदों और घायलों के पर्स, दस्तावेज व फाइलें बिखरी पड़ी रहीं, लेकिन एनआईए ने कोई मोबाइल या सामान जब्त नहीं किया। प्रत्यक्षदर्शियों और घायलों के बयान तक दर्ज नहीं किए गए। जब राज्य की भूपेश बघेल सरकार ने एसआईटी (SIT) का गठन किया, तो एनआईए और तत्कालीन भाजपा नेताओं ने कोर्ट से स्टे लाकर जांच क्यों रुकवाई? सब भाजपा की सोची समझी रणनीति था हिसमे बड़े स्तर के माओवादी शामिल रहे है।
दुर्ग शहर अध्यक्ष धीरज बाकलीवाल और मुकेश चंद्राकार ने कहा कि तत्कालीन भाजपा सरकार और एनआईए की कार्यप्रणाली से स्पष्ट है कि भाजपा झीरम का सच जनता के सामने नहीं आने देना चाहती। बड़े नक्सली लीडरों को बचाना और न्यायिक जांच में बाधा डालना इस बात का प्रमाण है कि घटना के वक्त से लेकर अब तक सच को दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस पार्टी न्यायालय के फैसले का सम्मान करती है, परंतु जब तक इस नरसंहार के पीछे छिपे मुख्य षड़यंत्रकारियों और राजनीतिक आकाओं का पर्दाफाश नहीं हो जाता, तब तक झीरम के शहीदों को सच्चा न्याय नहीं मिल सकता।
