पाटन। विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण के बड़े-बड़े दावे और पौधरोपण अभियान चलाए जाते हैं, लेकिन पाटन क्षेत्र के पतोरा, सेलूद, छाटा, अचानकपुर,धौराभाटा, परसाही,ढौर, मुड़पार,चुनकट्टा,गोंडपेंडरी, गुढ़ियारी, में संचालित खदानों और क्रशर इकाइयों की हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आती है। यहां खदानों से निकलने वाली धूल ग्रामीणों के स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा बन चुकी है।
नियमों के अनुसार खदान संचालकों को अपनी लीज भूमि के अनुपात में हरित पट्टी विकसित करते हुए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना अनिवार्य है, ताकि खनन और क्रशिंग से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सके। लेकिन क्षेत्र के अधिकांश खदानों में न तो पर्याप्त वृक्षारोपण दिखाई देता है और न ही हरित पट्टी का विकास। कई स्थानों पर पूरी लीज भूमि बंजर और धूल से अटी पड़ी है।
ग्रामीणों का आरोप है कि खदानों और क्रशर इकाइयों में पर्यावरणीय नियमों का पालन केवल कागजों तक सीमित है। दिनभर उड़ने वाली धूल खेतों, घरों और सड़कों तक पहुंच रही है, जबकि प्रदूषण नियंत्रण के लिए आवश्यक पानी का छिड़काव और हरियाली विकसित करने के उपाय नदारद हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पर्यावरण स्वीकृति की शर्तों में वृक्षारोपण और प्रदूषण नियंत्रण अनिवार्य है, तो संबंधित विभागों द्वारा इसकी निगरानी कितनी गंभीरता से की जा रही है? विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर ग्रामीण पूछ रहे हैं कि आखिर पर्यावरण बचाने की जिम्मेदारी केवल आम नागरिकों की है या फिर खनन और क्रशर कारोबार से जुड़े उद्योगों की भी कोई जवाबदेही तय होगी?
धूल के गुबार के बीच मनाया जा रहा पर्यावरण दिवस यह सवाल छोड़ रहा है कि क्या नियम सिर्फ फाइलों में हरे-भरे हैं, जबकि जमीन पर हरियाली गायब है?
