रायपुर,, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर में _“विभाजित विश्व की एकजुटता में संग्रहालयों की भूमिका”_ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के प्रथम सत्र में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता, संस्कृतिविद् एवं बीआरसी के वर्तमान अध्यक्ष श्री राहुल कुमार सिंह ने _“संग्रहालय और हमारा वैश्विक परिप्रेक्ष्य”_ विषय पर अपने व्याख्यान में कहा कि भारतीय संस्कृति के विभिन्न आयामों से संबंधित कलाकृतियाँ एवं वस्तुएँ विश्व के सुप्रसिद्ध संग्रहालयों जैसे बोस्टन, लंदन आदि संग्रहालयों में प्रमुख रूप से प्रदर्शित हो रही हैं।
इस प्रदर्शन के द्वारा भारतीय संस्कृति का प्रसार संपूर्ण विश्व में हो पा रहा है। ऐसे ही विश्व के अलग-अलग बड़े-बड़े संग्रहालयों में विश्व के अलग-अलग राष्ट्रों और संस्कृतियों की सांस्कृतिक विरासत प्रदर्शित हो रही है, जिसके अवलोकन से संपूर्ण विश्व के मानव समुदाय की एकजुटता एवं अपनेपन की भावना प्रवाहित होती प्रतीत होती है। अतः हम कह सकते हैं कि संग्रहालय इस प्रकार से विभाजित विश्व की मानवता को एकजुट करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कार्यशाला के द्वितीय सत्र में अपने व्याख्यान में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध इतिहासकार, पुरातत्वविद् एवं संस्कृति मर्मज्ञ प्रो. रमेन्द्र नाथ मिश्र ने _“मध्य भारत का सांस्कृतिक गौरव: संग्रहालय के विशेष परिप्रेक्ष्य”_ विषय में अपना व्याख्यान देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ और मध्य भारत में सबसे प्रचुर मात्रा में ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत बिना संरक्षण के विलुप्ति की कगार पर हैं। अतः इनका जल्द से जल्द अकादमिक एवं प्रशासनिक संरक्षण एवं दस्तावेजीकरण की आवश्यकता है। विभिन्न दुर्लभ पांडुलिपियाँ संरक्षण के अभाव में बर्बादी की ओर अग्रसर हैं। विद्यार्थियों का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि सभी विद्यार्थी एवं यहाँ उपस्थित सभी लोगों का परम कर्तव्य है कि वे उनके आस-पास की सांस्कृतिक विरासत को अपने स्तर पर संग्रहित करें और दुर्लभ सांस्कृतिक विरासत को प्रशासन के संज्ञान में भी लाएँ जिससे उनका उचित संरक्षण हो सके।
कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एवं पूर्व राज्य निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुशील त्रिवेदी (आई.ए.एस.) ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कार्यशाला की मुख्य विषय वस्तु पर विस्तार से चर्चा करते हुए श्री राहुल कुमार सिंह के द्वारा उनके उद्बोधन में _“संग्रहालय”_ शब्द को अनुचित मानने के तर्क का समर्थन करते हुए कहा कि वास्तव में _“संग्रहालय”_ शब्द के स्थान पर _“म्यूजियम”_ शब्द ज्यादा सार्थक एवं उचित है, क्योंकि इस ग्रीक शब्द का अर्थ चिंतन-मनन, विचार एवं विवेचना के ऐसे केंद्र के रूप में लिया जाता है जहाँ पर विश्व की समस्त घटनाओं का विशेषकर मानव के विकास के पड़ोसोपान के विषय में साक्ष्य सहित चर्चा एवं चिंतन होते थे। अतः _“संग्रहालय”_ शब्द सिर्फ वस्तुओं के संग्रह करने का एक भवन का ही संकुचित अर्थ प्रदान करता है परंतु _“म्यूजियम”_ शब्द का अर्थ व्यापक है। डॉ. त्रिवेदी ने अपने व्याख्यान में कार्यशाला के मुख्य विषय _“विभाजित विश्व की एकजुटता में संग्रहालयों की भूमिका”_ की व्याख्या करते हुए बताया कि 1980 के दशक में _“ग्लोबल विलेज”_ का कॉन्सेप्ट आया था। जिसका अर्थ था कि संपूर्ण विश्व एक गाँव की तरह है और जिस तरह से गाँव के लोग एक-दूसरे के विषय में भली-भाँति परिचित होते हैं वैसे ही _“ग्लोबल विलेज”_ की अवधारणा में विश्व के सभी देश एवं संस्कृति एक-दूसरे के विषय में जागरूक थे। इसके बाद 1990 और 2000 के दशक में _“ग्लोबलाइजेशन”_ की अवधारणा विकसित हुई जो कि बाजारवाद से प्रेरित था। इसमें एक देश अथवा संस्कृति दूसरे देश अथवा संस्कृति में अपने उत्पादों को बेचने के लिए दूसरों की संस्कृति के ज्ञान का उपयोग व्यावसायिक रूप से करने लगे। उदाहरण के तौर पर चीन ने भारतीय संस्कृति के ज्ञान के आधार पर दीवाली एवं होली जैसे महान भारतीय पर्व के लिए दीये, फुलझड़ियाँ और पिचकारी इत्यादि सामान बनाने लगे। इस कारण ग्लोबलाइजेशन की अवधारणा के स्थान पर _“नव राष्ट्रवाद”_ ने अपनी पैठ बना ली जिससे अपने ही संस्कृति को श्रेष्ठ मानने की संकीर्ण मानसिकता को बल मिला, जिससे संयुक्त सोवियत संघ जैसे महान राष्ट्र 18 टुकड़ों में बँट गया। ग्रेट ब्रिटेन एवं जर्मनी जैसे महान राष्ट्र भी कई टुकड़ों में विभक्त हो गए। आज यही संकीर्णता विश्व में युद्धोन्माद ले कर आया है। जिसके प्रभाव से रूस और यूक्रेन पिछले चार वर्षों से युद्धग्रस्त हैं, तो पिछले 6-7 महीनों से अमेरिका-इजराइल, एवं ईरान के बीच पश्चिम एशिया में भयंकर युद्ध के दुष्परिणाम पूरा विश्व भोग रहा है। ऐसी परिस्थिति में संग्रहालय में प्रदर्शित एवं संरक्षित विभिन्न संस्कृतियों की सांस्कृतिक विरासत हमसे हमारी एकजुटता के लिए आह्वान करती है। इस तरह से संग्रहालय की वस्तुएँ केवल देखने के लिए नहीं बल्कि वे हमें बिना बोले ही बहुत कुछ कहती हैं और भविष्य को संवारने और सतत विकास के लिए प्रेरित करती हैं। इस तरह से संग्रहालय संपूर्ण मानवजाति को एक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
कार्यशाला के प्रारंभ में मानवविज्ञान अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के विभागाध्यक्ष एवं इस कार्यशाला के संयोजक प्रो. जितेन्द्र कुमार प्रेमी ने अपने स्वागत उद्बोधन में सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए विषय परिचय कराते हुए कहा कि संग्रहालय साझी विरासत को याद दिलाकर हमें यह बताते हैं कि हम अलग नहीं हम एक हैं। दर्द, भूख, सुख, कला सभी कॉमन हैं।
विश्व के अलग-अलग देशों के पाषाण उपकरणों के अध्ययन से पता चलता है कि ये पाषाण उपकरण जिस पाषाण से बने हैं केवल उसी आधार पर ही थोड़ा अलग होते हैं, जबकि उनके आकार-प्रकार, उनकी बनाने की तकनीक एवं उपयोग के उद्देश्य एवं तरीके के आधार पर एक समान ही होते हैं जो यह बताती है कि हम सब की साझी संस्कृति है, साझा विरासत है।
भारत-पाक बँटवारे से संबंधित दिल्ली स्थित म्यूजियम जहाँ पर हिन्दू, मुस्लिम, सिख तीनों वर्गों के लोगों के डायरी, चाबी, सूटकेस इत्यादि रखे हुए हैं। जो हमें उन भयानक क्षणों की याद दिलाती है एवं हमें सिख देती है कि नफरत का परिणाम कितना गंभीर हो सकता है। रोने की आवाज का कोई धर्म नहीं होता। संग्रहालय लुप्त हो रही आदिवासी संस्कृतियों की आवाज बन कर उनके मानव विकास में योगदान एवं बौद्धिक श्रेष्ठता को चीख-चीख कर प्रदर्शित करती है।
जबकि अधिकांश लोग उन्हें पिछड़ा कहते हैं तो वहीं म्यूजियम उनकी श्रेष्ठता को सिद्ध करती है। इस तरह से संग्रहालय साझा अतीत को दिखा कर, साझा दर्द को महसूस कराकर, साझा भविष्य के लिए मार्ग बताती है। अतः संग्रहालय इस तरह से विभाजित विश्व को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
कार्यक्रम के अंत में अतिथि व्याख्याता डॉ. तुलसी रानी ठाकरे ने धन्यवाद ज्ञापन दिया
