रामायण जीना सिखाती है- भागवत मरना सिखाती है-वागीश जी महाराज

रायपुर। राजधानी के पुरानी बस्ती स्थित श्री महामाया देवी मंदिर में गुप्त नवरात्रि में आयोजित श्रीमद् भागवत यज्ञ महोत्सव के तीसरे दिन वृंदावन के राष्ट्रीय संत मारुति नंदन आचार्य वागीश जी महाराज ने कहा की रामायण जीना सिखाती है, तो भागवत मरना सिखाती है। राजा दशरथ जीवन और मृत्यु का फल पा गए। राजा दशरथ अपने जीवन में राघव राघव करते रहे। वही प्राण के अवसान के समय राम राम छह बार कहा‌‌। आसन का अर्थ आश ना हो बताया गया तथा जीवन में आसान लगाना सीखने की अपील की। भागवत की मंगलमय कथा मनोरोगी की चिकित्सा है। संसार में जो कष्ट है दुख परेशानी है वह तीन कारणों से है। देश दुनिया परिवार में तनाव है। तन से भले ही स्वस्थ दिखाई दें किंतु भीतर से परेशान है। तीन कारण में प्रथम कारण भूत का शोक,वर्तमान का मोह और भविष्य का भय कष्ट यह तीन कारणों से जीव परेशान है। शास्त्र कहता है बीती को याद मत करो उसको भूल जाओ‌ं। बीती ताहि बिसारी दे। महाराज जी ने कहा वर्तमान का बखान न करें यह मेरा, मैंने किया, मैं महान हूं। बाहर से चेतन दिखाई देते हैं किंतु भीतर जड़ है‌‌। मैं और मेरा तू और तेरा कष्ट का कारण है। वर्तमान को बना लो भविष्य अपने आप बन जायेगा‌। महामाया मंदिर न्यास समिति की के द्वारा कथा करने की प्रशंसा करते हुए यह रायपुर के जनता के लिए धन्य है, सौभाग्य है। माता हमेशा कथा कराते रहे। हम हमेशा कथा करते रहें। एक नवरात्रि में ही नहीं चारों नवरात्रि में जनकल्याणार्थ पुण्य कार्य जनहित में न्यास समिति करते हैं। उत्तर ने सुंदर बालक को जन्म दिया बालक का नामकरण विष्णु नाथ किया। इनका नाम परीक्षित हुआ। परीक्षित शब्द को परिभाषित करते हुए बताया कि पर इच्छित को परीक्षित कहते हैं। जो भगवान की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाए, हम भगवान की परीक्षा लेते हैं, भगवान हमारी परीक्षा लेते हैं। जीवन तब धन्य है जब भगवान की परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाए। भगवान परीक्षा में सब छिनते हैं‌ व्यापार खाली धन, मित्र परिवार से बिछड़ना ही परीक्षा है। इस विकट परिस्थिति में हम भगवान को पकड़ कर रखते हैं तो परीक्षा में पास हो जाते हैं। भगवान की परीक्षा में परीक्षित उत्तीर्ण हुए।

कलयुग में पांच तत्व हैं। जिसमें जुआ मदिरा परस्त्री गमन, मार काट और सोना। सोना हमेशा हराम करता है। महाराज श्री ने कहा कि पूजन में कभी लोहा स्टील का उपयोग न करें। पूजन में तांबा,कांसा, पीतल रजत और यदि स्वर्ण पात्र हो जाए तो बहुत बड़ा पूर्ण सौभाग्य है। जबरदस्ती शोषण नीति से कमाए धन पर कलयुग का वास होता है। वही नीति परिश्रम से कमाए हुए धन सुख शांति प्रदान करते हैं‌।

महाराज श्री ने कहा की जीव को नर्तकी नचा रही है। उसका उल्टा कर कीर्तन करो तो सब कष्ट दूर होकर दुष्प्रभाव नष्ट हो जाते हैं। शरीर के कथा श्रवण का अर्थ बताते हुए कान हृदय को निर्मल बना देता है‌ बिना राधा के सब आधा है‌।

श्री कृष्ण की आत्मा राधा है। भागवत समिति के समन्वयक चंद्रशेखर दुबे तथा मंदिर व्यवस्थापक पं विजय कुमार झा ने बताया है कि आज कथा के चतुर्थ दिवस श्री कृष्ण जन्मोत्सव का भव्य आयोजन होगा। सभी पीत वस्त्र धारण कर महामाया मंदिर रूपी वृंदावन धाम में पधारे।

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