दुर्ग.वर्तमान में छत्तीसगढ़ सरकार ने गौधन न्याय योजना की घोषणा की है ।जिसके मुताबिक कांग्रेस की राज्य सरकार ग्रामीणों से गोबर की खरीदी करेगी। इस गोबर का विभिन्न व्यवसायिक एवं कृषि कार्यों के लिए उपयोग करेगी। देश का पहला ऐसा राज्य है जो गोबर की खरीदी करेगी। बहुत से लोगों को सुनने में यह अटपटा एवं संशयात्मक लगा, परंतु आइये अब हम इस योजना के दीर्घकालिक, आर्थिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और स्वास्थ्यगत प्रभावों की सूक्ष्म विशलेषण करें।
गौवंश का सनातन धर्म में व्यापक आध्यात्मिक महत्व है। कहा जाता है कि गायों में तैंतीस कोटि देवता विद्यमान रहते हैं । अतएव गौ सेवा से पूरे देवताओं की प्रसन्नता होती है। गौ के अर्क एवं गोबर का भी विशेष महत्व है। गोबर को शास्त्रों में गौवर के नाम से जाना जाता है। सनातनी व्यस्था में पूजा कार्य हेतु गौरी एवं गणेश जी का (प्राकृत) निर्माण भी गोबर से होता है। इसे शुद्ध से भी अत्यंत शुद्ध माना जाता है। यज्ञ में, पंचगव्य में एवं गोवर्धन पूजा में गाय एवं गोबर की महिमा है।
अगर गोबर की वैज्ञानिक महिमा पर ध्यान दें, तो वैज्ञानिकों का मत है कि गोबर में फासपोरस, नाइट्रोजन, पोटाश, मैग्नीज, लोहा आदि खनिजों में अंश विद्वमान हैं। आज भी गांव में घरों के आंगन की लिपाई एवं दीवारों की पुताई गोबर से ही की जाती है क्योंकि यह कीटनाशक है एवं घरों को ठंडा भी रखता है। गोबर के कंडों को जलाकर कीटों एवं मच्छरों को भगाया जाता है। इस धुए से वातावरण भी शुद्ध हो जाता है।
आज भी गांव में विशेष प्रकार की व्यवस्था प्रचलित है, जिसके तहत अगर गांव में किसी की मृत्यु होती है तो दाह संस्कार के लिए हर घर से गोबर कंडा दान किया जाता है। इसका पौराणिक महत्व है। गोबर ऊर्जा का एक सशक्त विकल्प भी है। गोबर के विभिन्न प्रकार के उत्पादों का जैसे-धूप बत्ती, अगरबत्ती, गमले, दीए का बाजारों में अच्छा प्रतिषाद मिल रहा है। आयुर्वेद में इलाज के लिए गोबर एवं उसके राख का भी अत्यंत महत्व है। पिछले वर्ष छत्तीसगढ़ राज्य सरकार ने स्वसहायता समूह की महिलाओं के माध्यम से गोबर से बने दीए का उत्पादन कराया था, इस दीयों की डिमांड राज्य के अलावा दूसरे प्रदेशों में डिमांड ज्यादा थी।
इस गोबर खरीदी के संबंध में राज्य सरकार की व्यवसायिक दृ़ष्टिकोण को समझने की कोशिश करते हैं। पशुपालन विभाग छत्तीसगढ़ के 2019 के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में पूरे छत्तीसगढ़ प्रदेश में गायों की संख्या 99.84 लाख एवं भैंसों की संख्या 11.75 लाख है। अर्थात पशुधन की संख्या 111.59 लाख है। एक अनुमान के मुताबिक एक पशु प्रतिदिन 5 किलो गोबर देती है। अत: प्रतिदिन पूरे प्रदेश में 55795000 किलोग्राम गोबर प्राप्त होगा। प्रतिवर्ष 2 करोड़ 3 लाख 65 हजार 175 टन गोबर प्राप्त होगा। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रति दो किलो गोबर से एक किलो वरमी कम्पोस्ट का निर्माण किया जाता है। इसके अनुसार प्रतिवर्ष 1 करोड़ 1 लाख 82 हजार 587 टन वरमी कम्पोस्ट का उत्पादन हो सकता है।
राज्य सरकार की मंत्रिमण्डलीय उपसमिति द्वारा 1.50 रुपए प्रतिकिलो के भाव से गोबर खरीदने की अनुशंसा की है तो लगभग 30 अरब 54 करोड़ 77 लाख 13 हजार रुपए का भुगतान पशुपालकों को करेगी। वरमी कम्पोस्ट का बाजार भाव 5 रुपए प्रतिकिलो से लेकर 10 रुपए प्रतिकिलो है। अगर 5 रुपए प्रतिकिलो का भाव वरमी कम्पोस्ट उत्पादकों को मिलता है। तो 50 अरब 91 करोड़ 29 लाख 35 हजार 500 रुपए का उत्पादकों को प्राप्त होगा। अर्थात ग्रामीण व्यवस्था में पशुपालकों, किसानों एवं मजदूरों में कुल लगभग 71 अरब रुपए की आमदानी होगी।
2019 के कृषि विभाग के मुताबिक प्रदेश में खरीफ एवं रबि की फसलों के लिए रसायनिक खाद यूरिया, सुपरफासपेट, डीएपी एवं पोटाश की लगभग 10लाख 10 हजार 366 टन खपत हुआ है। जिसका बाजार 12 अरब 73 करोड़ 16 लाख 8 हजार रुपए है जो सरकार के पास शुद्ध रूप से बचेगा।
कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार 2019 में छत्तीसगढ़ राज्य में लघु, सीमांत एवं दीर्घ किसानों को मिलकर लगभग 37 लाख 46 हजार किसान हैं। जिनकी कुल कृषि भूमि का रकबा 50 लाख 84 हजार 49 हेक्टेयर है। जैविक कृषि से खेती करने वालों किसानों के अनुसार धान की खेती के लिए प्रति एकड़ 100 किलो वरमी कम्पोस्ट की जरुरत पड़ती है एवं सब्जी आदि के उत्पादन में इससे कुछ ज्यादा मात्रा की जरुरत होती है। अत: यह माना जा सकता है कि पूरे छत्तीसगढ़ के कृषि रकबा पर उत्पादित वरमी कम्पोस्ट से जैविक खेती की जा सकती है जो अत्यंत क्रांतिकारी एवं ऐतिहासिक कदम होगा। इसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ होगी। किसानों के रसायनिक खादों का उपयोग कम करने से कृषि लागत बहुत कम हो जाएगी। जैविक खादों के उपयोग से धरती की उवर्रक शक्ति बहुत अच्छी हो जाएगी एवं जनमानस को रसायनविहिन खाद पदार्थों की प्राप्ति होगी। रसायनिक खाद से कई बीमारियां होती है, जैविक खेती से खाद पदार्थों भी शुद्ध होने लगेंगे और इससे जनमानस को कई गंभीर बीमारियों से मुक्ति मिल जाएगी। गोबर ऊर्जा के सशक्त विकल्प से लकडिय़ों का उपयोग कम होगा। इससे वनों की सुरक्षा होगी। प्रत्येक पशु पालक अपने घर पर ही पशुधन की रक्षा करेगा। जिससे गंदगी से बचेंगे, सड़कों पर दुर्घटना से बचेंगे एवं पर्यावरण अत्यंत साफसुथरा हो जाएगा। ग्रामीण मजदूरों को वर्ष भर गांव में रोजगार मिलने से शहरों एवं अन्य प्रदेशों की ओर पलायन में रोक लगेगी। जिससे शहरी जनसंख्या भी नियंत्रित रहेगी और बेरोजगारी दर भी नियंत्रित हो जाएगी।
हमारा गांव एवं ग्रामीण आत्मनिर्भर होंगे और यह प्रयास भारतवर्ष को एक नई दिशा देगा। एवं पूरे विश्व के लिए अनुकरणीय मार्ग प्रशस्त करेगा।
राज्य सकार चाहे तो इस योजना को मनरेगा से जोड़कर अत्यंत लाभकारी एवं प्रभावकारी बना सकती है। राज्य में कृषि का विस्तार किसान 37,46,480 कृषि भूमि 5048049 हेक्टेयर भूमि है।
