अलसी के डंठल से लिनेन प्रयोगशाला का लोकार्पण एवं महिलाओ को अलसी के रेशे से धागा बनाने प्रशिक्षण का शुभारंभ

सुनील नामदेव की खबर,,

बेमेतरा रेवेन्द्र सिंह वर्मा कृषि महाविद्यालय एवं अनुसंधान केन्द्र, बेमेतरा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना तथा उपरियोजना वेस्ट टू वेल्थ के अंतर्गत संचालित परियोजना ष्लिनेन फ्राम लिनसीड स्टाकष् के प्रयोगशाला भवन का लोकार्पण डॉ. गिरीश चंदेल, माननीय कुलपति, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के कर कमलों द्वारा किया गया। इस परियोजना के अंतर्गत पूर्व में विकसित अलसी के डंठल से कपडा बनाने की तकनीक में आवश्यक परिसोधन कर औधोगिक स्तर पर कपडे बनाने की सुगम तकनीक विकसित करें तथा यह भी सुनिश्चित करें कि महिलाओं एवं किसानों की में आय में उत्तरोत्तर वृद्धि हो, इसके साथ-साथ इस काम को इस तरह बढाया जाये कि भविष्य में बडे-बडे औधोगिक उद्यमी रुचि दिखायें। इस के साथ ही उन्होने यह भी सुझाव दिया कि अलसी के रेशे के साथ साथ अन्य प्रचलित रेशा को मिलाकर कपडा बनाने की तकनीक विकसित कर उनकी गुणवत्ता जांच कर आम जनता के लिये उपलब्ध कराया जायें। उन्होने यह भी सुझाव दिया कि इससे निर्मित कपडे की कीमत को कम करने का प्रयास करें। कृषि में रेशे वाली अन्य फसलें जैसे अरंडी, भिन्डी, आदि का धागा बनाने के लिये प्रयोग करें जिससे इन फसलों का भी उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था सुधारने में मदद मिलें। उन्होने प्रयोगशाला में उपलब्ध सुविधाओं को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की तथा संस्था में कार्य कर रही महिलाओं को प्रोत्साहित किया कि इस काम को अपना कर वे अपनी आर्थिक परिस्थिति को सुधार सकते है। इस प्रयोगशाला में जिला खनिज संस्थान न्यास बेमेतरा के सौजन्य से ग्रामीण महिलायों को धागा बनाने एवं कपडा बनाने के लिये महिलाओे को प्रशिक्षित करने हेतु आर्थिक सहयोग प्रदान किया है।इस तारतम्य में आज 25 सितंबर 2023 से बीस दिवसीय अलसी के रेशे से धागाकरण का प्रशिक्षण का शुभारंभ किया गया। इन महिलायों को प्रशिक्षण उपरांत धागा बनाने का चरखा प्रदान किया जायेगा। जिससे ये महिलायें संस्था से अलसी का रेशा लेकर अपने-अपने घर में धागा बनाने का काम करेंगी। ये धागा संस्था को वापिस करेंगें जिसके एवज में 1000/- रुपये प्रति किलो मेहन ताना भुगतान किया जायेगा। धागा प्रति सप्ताह संस्था के मानक के अनुसार तैयार कर देना होगा। इसमें महिलाओ को धागा बनाने के लिये अधिकतम मात्रा निर्धारित नहीं की गई। इस तरह से प्रत्येक महिला 3000 हजार से 4000 रुपये प्रति माह अपने घरेलु कार्य करते हुये कमा सकती है तथा अपने जीवन स्तर को खुशहाल बना सकती है। इस महती परियोजना को संचालित करने में वै़ज्ञानिकों का एक समूह कार्य करता है जिसमें डॉ. के. पी. वर्मा, नोडल आफिसर, डॉ. टी. डी. साहु, पी. आई. एवं डॉ. यु. के. धु्रव, को-नोडल आफिसर एवं इंजी. पी. देवांगन, परियोजना अभियंता के सामूहिक प्रयास से अलसी के रेशे से निर्मित कपडे जो अभी तक प्रयोगशाला तक सीमित थे वे आज जनता के क्रय हेुत संस्था में उपलब्ध है जो कि उच्च गुणवत्ता युक्त त्वचा के अनुकूल प्राकृतिक रेशे से निर्मित लिनेन कपड़े है। इस सभी कार्य को संपादित करने में संस्था के अधिष्ठाता एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष डॉ. आर. एन. सिंह, एवं उनके संपूर्ण कार्यालय का विषेश मार्गदर्शन एवं योगदान रहा। इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केन्द्र बेमेतरा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं सभी विषय वस्तु विषेषज्ञों का प्रशंसनीय सहयोग रहा। इस अवसर पर महाविद्यालय के सभी अधिकारीगण-कर्मचारीगण एवं छात्र-छात्रायें उपस्थित थे ।

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