आदिवासी संस्कृति को सुरक्षित रख भविष्य में भी धरोहर की महक बरकरार रहे,,आसमा ग्राम में बादल प्रोजेक्ट अहम भूमिका निभा रहीं है,,

बस्तर की आदिवासी संस्कृति को संजोकर नई पीढ़ी को हस्तांतरित करने का काम कर रहा “बादल”बादल से प्रशिक्षण प्राप्त कर देश मे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन कर रहें कलाकार…बस्तर जिले के मुख्यालय जगदलपुर के नजदीक ग्राम आसना में राज्य सरकार की शैक्षणिक गतिविधि जिसमे बस्तर के संस्कृति को सहेजने संवारने का कार्य किया जा रहा है,,जिससे वर्तमान एवम भविष्य की पीढ़ी भी समझेगी,, इसी पर आधारित यह रिपोर्ट,,जब आदिवासी जीवन के विविध पहलुओं की बात आती है – सांस्कृतिक विविधता, असाधारण सुंदर परिवेश जिसमें वे रहते हैं, भौगोलिक अलगाव के साथ – तो बस्तर देश में एक विशेष स्थान रखता है। साहित्य, लोक गीत और नृत्य के साथ-साथ भाषाएँ इस क्षेत्र के आदिवासियों को उनकी विशिष्टता के लिए खड़ा करती हैं। विभिन्न कला रूप, पारंपरिक और देशी संगीत वाद्ययंत्र, हस्तशिल्प और पुराने कला रूप देश भर के पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण हैं।बस्तर की पारंपरिक संस्कृति और विविधता को पूरे देश और दुनिया के सामने लाने के लिए, मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की मंशा अनुरूप छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 2021 में BADAL (बस्तर एकेडमी ऑफ डांस, आर्ट एंड लिटरेचर) नामक एक विशेष परियोजना की स्थापना की गई थी।यह पहल उन अद्भुत कला रूपों को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई थी, जिन्हें बस्तर के कलाकार प्राचीन काल से ही आगे बढ़ाते रहे हैं, और ताकि इस लोक कला और समृद्ध कला को सिखाकर उन्हें भावी पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके। “बादल” द्वारा बस्तर की संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य बखूबी किया जा रहा है ,स्थापना से लेकर अब तक “बादल” में लगभग तीन हजार से अधिक प्रतिभागी विभिन्न कलाओं में प्रशिक्षण प्राप्त कर बस्तर की समृद्धशाली संस्कृति से देश दुनिया को परिचित करा रहे हैं,, विगत दिनों खजुराहो में हुए इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में यहाँ के दो युवा कलाकार धनुर्जय बघेल और जोगी राम को उनके गोदना आर्ट की वजह से सम्मानित किया गया वहीं गुजराल बघेल द्वारा बनाई गई पेंटिंग को विश्व बाघ दिवस के अवसर पर उत्तराखंड के जिम कार्बेट नेशनल पार्क में आयोजित प्रदर्शनी में पहला स्थान मिला….सामाजिक ताना बाना…बादल में आदिवासी समाज के जानकार लोगों को भी जोड़ा गया है जिससे बस्तर के धुरवा भतरा मुंडा कोया हल्बा मुरिया समाज के लोग शामिल हैं।ये अपनी-अपनी संस्कृति के अभिलेखीकरण हेतु निरंतर कार्य कर रहे हैं।BADAL उन सभी आवश्यक सुविधाओं से सुसज्जित है जो एक अच्छी अकादमी में होनी चाहिए, जिसमें एक कार्यालय भवन, एक प्रशिक्षण भवन, एक छात्रावास और मेस भवन, दो खुले थिएटर या एम्फीथिएटर, एक रिकॉर्डिंग स्टूडियो, पर्यटन झोपड़ी, बस्तर की एक प्रदर्शनी शामिल है। बस्तर आदिवासी समाज और संस्कृति के विद्वान वर्तमान में BADAL अकादमी परिसर में आदिवासी संस्कृति, रीति-रिवाजों, लोकजीवन, त्योहारों, लोक संगीत और लोक नृत्य को संहिताबद्ध और रिकॉर्ड करने पर काम कर रहे हैं।इसके अलावा, अकादमी में निर्मित तीन भवनों का नाम वीर शहीदों के नाम पर रखा गया है। इनमें प्रशासनिक भवन का नाम शहीद झाड़ा सिरहा के नाम पर, आवासीय परिसर का नाम हल्बा जनजाति के शहीद बल्लेसिंह के नाम पर और पुस्तकालय एवं अध्ययन भवन का नाम धुरवा समाज के शहीद वीर गुंडाधुर के नाम पर रखा गया है।खैरागढ़ इंद्रकला संगीत विश्वविद्यालय से जुड़कर बादल में अब गायन तबला लोकसंगीत और चित्रकला की कक्षाएं भी संचालित की जा रही है।।।बादल आने वाले समय मे एक ऐसा केंद्र बन जायेगा जहाँ बस्तर के बारे में सभी जानकारी एक स्थान पर मिल जाएगी।

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