पांडुका अंचल में दान का पर्व छेरछेरा मनाया गया।

खबर हेमंत तिवारी पांडुका – साल का पहला त्यौहार व छत्तीसगढ़ का लोकपर्व दान और पुण्य के त्यौहार छेर छेरा को बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। यह त्यौहार अन्न दान का महापर्व माना जाता है। छत्तीसगढ़ में छेर छेरा का पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। खास तौर पर प्रतिवर्ष यह पर्व पौष पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस तरह मनाते हैं लोकपर्व का त्यौहार छेर छेरा* छेर छेरा पर्व के दौरान लोग घर-घर जाकर अन्न का दान मांगते हैं। छेर छेरा ,छेर छेरा मई कोठी के धान ला हेर हेरा कहकर युवक व छोटे बच्चे घर-घर जाकर नृत्य करते हैं। इस दिन सुबह से ही बच्चे, युवक व युवतियां हाथ में टोकरी, बोरी ,बैंड बाजा ,रेडियो,माइक,आदि लेकर घर-घर छेरछेरा मांगते हैं। वहीं युवकों की टोलियां नृत्य कर घर-घर पहुंचती हैं। धान मिंसाई हो जाने के चलते गांव में घर-घर धान का भंडार होता है, जिसके चलते लोग छेर छेरा मांगने वालों को दान करते हैं।इन्हें हर घर से धान, चावल व नकद राशि मिलती है। इसलिए विशेष यह त्यौहारइस त्योहार के दिन कामकाज पूरी तरह बंद रहता है। इस दिन लोग प्रायः गांव छोड़कर बाहर नहीं जाते। इस दिन अन्नपूर्णा देवी तथा लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो भी बच्चों को अन्न का दान करते हैं, वह मृत्यु लोक के सारे बंधनों से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं। इसके अलावा छेर-छेरा के दिन कई लोग खीर और खिचडी का भंडारा रखते हैं, जिसमें हजारों लोग प्रसाद ग्रहण कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

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