रोशन सिंह@उतई ।नगर के दशहरा मैदान बाजार चौक में कृपालु दरबार समिति द्वारा आयोजित पंद्रह दिवसीय प्रवचन के चल रहे दार्शनिक प्रवचन में जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज की कृपा प्राप्त प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी जी के मुखारविंद से विलक्षण धारा प्रवाह प्रवचन की गंगा में अवगाहन करने श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है।
प्रवचन के ग्यारहवें दिन में दीदी जी ने ईश्वर की प्राप्ति के विषय में बताते हुए कहा कि ईश्वर प्राप्ति के तीन ही मार्ग है कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग इसमें प्रथम मार्ग कर्मयोग का विस्तार करते हुए और वेद, गीता भागवत, रामायण के प्रमाण देते हुए उन्होंने कहा की एक ओर जहाँ शास्त्र पद कर्म धर्म के पालन का आदेश देते है वही दूसरी ओर कर्म धर्म की घोर निंदा भी करते हैं। इस विरोधाभाष का समन्वय करते हुए देवी जी ने कहा की कर्म चार प्रकार के होते है। पहला नित्य कर्म अर्थात् प्रतिदिन किया जाने वाला कर्म जैसे आदि दूसरा नैमित्तीक कर्म अर्थात जन्म मृत्यु सूर्यग्रहण चन्द्रग्रहण आदि के समय किया जाने वाला कर्म तीसरा काम्यकर्म अर्थात् संसारी कामनाओं की पूर्ति के लिए किया जाने वाला कर्म अर्थात कोई पाप हो जाने पर उसकी निती के लिए किया जाने वाला कर्म, चातुर्मास व्रत यज्ञ पूजा पाठ आदि।
श्रीश्वरी देवी जी ने आगे कहा कि प्रत्येक कर्म धर्म के पालन मे छह नियम है जिनका वेदों के अनुसार शत प्रतिशत पालन आवश्यक है। अर्थात् देश, काल, पदार्थ, कर्ता, मंत्र कर्म इन शर्तों का सही पालन होना चाहिए जो की इस कलयुग में समय ही नहीं है। वेद मंत्रों में स्वर लगे होते है जिनका सही-सही उच्चारण होनी चाहिए। अन्यथा वो यजमान का ही नाश कर देते है। वेदो में था है वृत्तासुर नामक राक्षस ने विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ करवाया किन्तु वैदिक स्वर में त्रुटि हो जाने से यो राक्षस हि मारा गया। यदि ये कर्म सही-सही किये जाते है तब इसका फल है स्वर्ग जो कि माया का ही एक लोक है और यदि त्रुटि हो जायेगी तो उसका फल है नरक अतएव कर्म धर्म के द्वारा माया निवृत्ति असंभव है इसलिए हमारे शास्त्रों ने कर्मयोग का आदेश किया है। अर्थात् मन से निरंतर हरि-गुरु का चिन्तन एवं शरीर से कर्म का पालन इसका परिणाम है माया निवृत्ति एवं ईश्वर प्राप्ति कृपालु जी महाराज अपने भक्ति शतक नामक ग्रंथ में कर्मयोग की परिभाषा में कहते हैं-
मन हरि में तन जगत में कर्म योग यहि जान
तन हरी में मन जगत में ये महान अज्ञान
