जो जीव को माया निवृत्ति करा दे और जीव को ईश्वरीय प्रेम प्रदान करे वही वास्तविक गुरू है- श्रीश्वरी देवी

रोशन सिंह@उतई ।नगर के दशहरा मैदान बाजार चौक में कृपालु दरबार समिति द्वारा आयोजित आध्यात्मिक दार्शनिक रसमय प्रवचन में जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज की कृपा प्राप्त प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी जी ने महापुरुष तत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिना महापुरुष की शरणागत किये किसी जीव को भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती भागवत से उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक किसी वास्तविक महापुरुष की चरण रज से हम अपने आप को अभिषिक्त नहीं कर लेते तब तक निवृत्ति तो बहुत दूर की बात है इम ईश्वरीय जगत में पहला क़दम भी नहीं रख सकते। प्रारंभ में तत्व ज्ञान प्रदान करने से लेकर साधना पथ की कठिनाईयों का समाधान करना और फिर अंतःकरण की शुद्धि के पश्चात अंतिम तत्व ईश्वरीय प्रेम प्रदान करना ये सब गुरू ही करता है। इसलिए गीता में श्री कृष्ण ने कहा-

तद्विद्विप्रणिपातेन परिप्रनेन सेवया “

अर्थात भगवान के लिए हमें सर्वप्रथम गुरु की पूर्ण शरणागति करनी होगी प्रणिपातेन । अर्थात पूर्ण जिज्ञासु भाव से गुरु से ईश्वर संबंधि शंकाओं पर प्रश्न करना होगा और फिर उनकी तन मन धन से सेवा करनी होगी जितनी हमारी गुरु के प्रति सेवा वासना बढ़ेगी उतनी द्रुत गति से हमारा अंतःकरण शुद्ध होगा, हमारा मन संसार से हटेगा और हम ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर होंगे। श्री कृष्ण की नित्य सेवा प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य है जो कि प्रथम गुरु सेवा से ही हमें प्राप्त होगी ।

गुरू शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए दीदी जी ने कहा कि

रोशन सिंह उतई ।नगर के दशहरा मैदान बाजार चौक में कृपालु दरबार समिति द्वारा आयोजित आध्यात्मिक दार्शनिक रसमय प्रवचन में जगद्गुरू श्री कृपालु जी महाराज की कृपा प्राप्त प्रचारिका सुश्री श्रीश्वरी देवी जी ने महापुरुष तत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिना महापुरुष की शरणागत किये किसी जीव को भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती भागवत से उद्धरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब तक किसी वास्तविक महापुरुष की चरण रज से हम अपने आप को अभिषिक्त नहीं कर लेते तब तक निवृत्ति तो बहुत दूर की बात है इम ईश्वरीय जगत में पहला क़दम भी नहीं रख सकते। प्रारंभ में तत्व ज्ञान प्रदान करने से लेकर साधना पथ की कठिनाईयों का समाधान करना और फिर अंतःकरण की शुद्धि के पश्चात अंतिम तत्व ईश्वरीय प्रेम प्रदान करना ये सब गुरू ही करता है। इसलिए गीता में श्री कृष्ण ने कहा-

तद्विद्विप्रणिपातेन परिप्रनेन सेवया “

अर्थात भगवान के लिए हमें सर्वप्रथम गुरु की पूर्ण शरणागति करनी होगी प्रणिपातेन । अर्थात पूर्ण जिज्ञासु भाव से गुरु से ईश्वर संबंधि शंकाओं पर प्रश्न करना होगा और फिर उनकी तन मन धन से सेवा करनी होगी जितनी हमारी गुरु के प्रति सेवा वासना बढ़ेगी उतनी द्रुत गति से हमारा अंतःकरण शुद्ध होगा, हमारा मन संसार से हटेगा और हम ईश्वर प्राप्ति की ओर अग्रसर होंगे। श्री कृष्ण की नित्य सेवा प्राप्ति ही हमारा लक्ष्य है जो कि प्रथम गुरु सेवा से ही हमें प्राप्त होगी ।

गुरू शब्द का अर्थ स्पष्ट करते हुए दीदी जी ने कहा कि जो जीव को माया निवृत्ति करा दे और जीव को ईश्वरीय प्रेम प्रदान करे वही वास्तविक गुरू है। लेकिन ऐसा वही कर सकता है जिसकी स्वयं की माया निवृत्ति हो चुकी हो और जिसने स्वयं ने ईश्वर को प्राप्त कर लिया हो इसलिए वेद भागवत एवं गीता से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि गुरू क्षेत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए अर्थात वो समस्त वेदों, शास्त्रों का ज्ञाता भी हो और स्वयं ने ईश्वर प्राप्ति की हो। ऐसे गुरु की ही इमको शरणागति करनी है। लेकिन महापुरुष को हम कैसे पहचानें इत्यादि आगे के प्रवचनों में बताया जाएगा।

जीव को माया निवृत्ति करा दे और जीव को ईश्वरीय प्रेम प्रदान करे वही वास्तविक गुरू है। लेकिन ऐसा वही कर सकता है जिसकी स्वयं की माया निवृत्ति हो चुकी हो और जिसने स्वयं ने ईश्वर को प्राप्त कर लिया हो इसलिए वेद भागवत एवं गीता से प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि गुरू क्षेत्रिय एवं ब्रह्मनिष्ठ होना चाहिए अर्थात वो समस्त वेदों, शास्त्रों का ज्ञाता भी हो और स्वयं ने ईश्वर प्राप्ति की हो। ऐसे गुरु की ही इमको शरणागति करनी है। लेकिन महापुरुष को हम कैसे पहचानें इत्यादि आगे के प्रवचनों में बताया जाएगा।

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