डॉ शालिनी यादव की एक नई रचना प्रस्तुत है,,ओ बोलते सात समानातंर रास्ते

प्रसिद्ध कवित्री शालिनी यादव के कलम से प्रस्तुत,,

समानांतर रास्ते

एक

झूठें
विश्वासघाती
और छद्मवेशी मनुष्यों के
संसार में
अकेली चल रही हैं आजकल
मेरी रूह फँसी
हाँड-माँस की इस देह में…

दो

अपनी भुमिका दृढ़ करने की
कोशिश करती
और एक अनोखी हसरत के संग
जहाँ-तहाँ विचरण करती
मेरी घुमंतू रूह को सिवाय उसके
कोई बांध ना सका था कभी
सांसारिक ताने बाने के बीच…

तीन

एक हसरत मासुम शिशु जैसी
जीती थी दिन-रात अन्तस में
सींचती थी अपने रक्त से
पालती थी पलकों पर
नाजुक ख्वाब की तरह
बस एक ही हसरत
सच्ची मोहब्बत पाने की…

चार

उसकी रूह के करीब आकर
ठहर गई थी मेरी रूह
उसकी रहस्यमयी मुस्कान पर
उन बोलती आँखों पर
और वो फड़कते होंठ
कहना गलत न होगा
रूक गया था वक्त वही मेरे लिए…

पाँच

साथ चले थे कुछ लम्हें हम
बिना कुछ चाहे अजीजों की तरह
फिर रास्ते अलग हो गए
अब रूह नही अटकेगी कभी
किसी और के चेहरे पर
किस्मत ने मिलाया था उससे
जीवनपथ के मोड़ पर…

छह

जहां से रास्ते समानांतर फूट गए
कभी फिर ना मिले शायद
खड़ा था उस मोड़ पर वो बेवफा
उसी शरारती मुस्कान के साथ
वही खनकती आवाज
किसी और राहगीर के साथ
जहां वादे निभाने के मुझसे किए थे…

सात

कुछ लम्हें संग बिताकर
चल दिया वो किसी और का हाथ थाम
मेरा परित्यक्त मन बहुत उद्गिन हैं
जीवन का ये लम्बा सफर
जहाँ हम अजनबी हो गए फिर
कभी ना मिलने वाले
रास्तों की तरह…

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