अप्रत्याशित जीत, हजारों करोड़ के विकास के बाद, हुवे निगम चुनावों में दोनो राष्ट्रीय दलों में वोटों का अंतर मात्र 2701
कांग्रेस 21,भाजपा12, निर्दलीय7.सरकार बनाने में कांग्रेस कामयाब,किंतु निर्दलीय भी दोनो राजनीतिक दलों से कमजोर नही 17 हजार से ज्यादा वोट बटोरने में कामयाब हुवे..जो सत्ता से नाराजगी का परिणाम?
एक साल में रिपोर्ट कार्ड सुधारने कांग्रेस को करनी होगी कड़ी मेहनत और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर
भाजपा में भी वर्चस्व की लड़ाई चरम पर किंतु मोदी और योगी का हिंदुत्व कार्ड पड़ सकता है भारी .75 से 90 प्रतिशत युवा और नए चेहरे उतार सकती है मैदान में
आम आदमी पार्टी की धमाकेदार एंट्री नुकसान किसे यह वक्त बताएगा किंतु पंजाब दोहरा दे बुद्धिजीवी मतदाता तो आश्चर्य नहीं
दुर्ग ग्रामीण (न्यूज24कैरेट/सतीश पारख) विधानसभा चुनावों को साढ़े तीन साल होने को है सरकार के वर्तमान कार्यकाल की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। 2023 के अंत में विधानसभा के चुनाव होने हैं उस हिसाब से डेढ़ साल का समय शेष है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल चुनावी तैयारी प्रारंभ कर चुके हैं जल्द ही वो प्रदेश के सभी विधानसभाओं का दौरा प्रारंभ करने वाले हैं इस दौरान वो क्षेत्र में वर्तमान विधायकों की रिपोर्ट भी लेंगे। मुख्यमंत्री के दौरे की सुगबुगाहट के साथ ही कांग्रेसी विधायकों की धड़कने भी बढ़ने लगी है । यदी रिपोर्ट ठीक रही तो रिपिट होंगे नही तो 75 प्रतिशत वर्तमान विधायकों की टिकिट कटनी भी तय मानी जा रही है।
रमन सरकार के तीन कार्यकाल के बाद भूपेश सरकार का सत्ता पर काबिज होना ,शायद भाजपा और रमन सरकार का जमीनी विरोध का परिणाम था की जनता ने मुख्य विपक्ष कांग्रेस को हाथोंहाथ लिया और एक आंधी भाजपा को उड़ा ले गई और कांग्रेस अप्रत्याशित जीत के साथ सत्ता पर काबिज हो गई।किंतु अब जनता के बीच भूपेश सरकार को अपने रिपोर्ट कार्ड के आधार पर जाना होगा । सरकार ने पुरानी पेंशन योजना लागू कर दी है किंतु इसके बाद भी शासकीय कर्मचारियों का झुकाव सरकार की ओर होगा यह स्पष्ट रूप से नही कहा जा सकता क्योंकि केंद्र सरकार जहां अपने कर्मचारियों को 31 प्रतिशत महंगाई भत्ता दे रही तो वही राज्य सरकार के कर्मचारियों को मात्र 17 प्रतिशत दिया जा रहा है जिससे उन्हें 14 प्रतिशत का नुकसान हो रहा है साथ ही सहायक शिक्षक वर्ग 03 लगभग 80 हजार है ,सरकार ने सत्ता में आते ही वेतन विसंगति दूर करने की बात कही थी किंतु साढ़े तीन वर्षों में सरकार का इस और रुख स्पष्ट नही होने से नाराजगी देखते ही बनती है।शिक्षित बेरोजगारों को भत्ता पर अब तक सरकार किसी फैसले पर नही पहुंच पाई है।शराब बंदी का मामला भी है जो महिला वर्ग को सोचने मजबूर कर सकता है ।ऐसे ही बहुत से विषय है जिसका प्रभाव प्रदेश की सभी विधानसभाओं में देखने को मिलेगा जिससे दुर्ग ग्रामीण भी अछूता नहीं होगा।।
15 साल बाद कांग्रेस के सत्ता में आने से प्रदेश भर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में एक जोश देखने को मिला था किंतु जैसे जैसे सरकार के दिन आगे बढ़ते गए कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी। जिन भावनाओं को लेकर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के बीच खुशी की लहर थी वो ज्यादा दिन देखने को नहीं मिली??क्योंकि उनके मंसूबों पर सरकार के इर्द गिर्द घेरा बना चुके दलाल किस्म के लोगों ने पानी फेर दिया???पर किया भी क्या जा सकता था सिर्फ इस कहावत को याद करने के की अब पछताए का होत जब चिड़िया चुग गई खेत???

दुर्ग ग्रामीण विधानसभा का वर्तमान हिस्सा एक समय भिलाई दुर्ग और खेरथा का हिस्सा हुवा करता था।परिसीमन के बाद दस प्रतिशत खेरथा ,बीस प्रतिशत दुर्ग का ग्रामीण हिस्सा और 70 प्रतिशत भिलाई विधानसभा का हिस्सा जो वर्तमान में रिसाली निगम बन चुका है को मिलाकर एक नए विधानसभा दुर्ग ग्रामीण का सृजन हुवा।परिसीमन पूर्व में इन दोनो ही विधान सभा दुर्ग व भिलाई का नेतृत्व सामान्य वर्ग से मोतीलाल वोरा और बदरुद्दीन कुरैशी प्रेमप्रकाश पांडे ने किया ।किंतु परिसीमन के बाद जातीय समीकरण बिठाने के जुगत में दोनो ही मुख्य राजनीतिक दलों ने इसे सामान्य होते हुवे भी पिछड़ा वर्ग के लिए ही सुरक्षित कर दिया। तब से प्रतिमा चंद्राकर कांग्रेस ,रमशिला साहू भाजपा ,ताम्रध्वज साहू कांग्रेस ,वर्तमान में दुर्ग ग्रामीण का नेतृत्व कर रहे है।आगे भी इस सीट पर सामान्य वर्ग को नेतृत्व करने का अवसर मिले इसकी संभावना कम है। किंतु रिसाली निगम जो मिनी भारत कहा जाता है क्योंकि भिलाई इस्पात संयंत्र के कारण देश के लगभग बहुतायत प्रदेशों के लोग यहां आकर स्थाई रूप से निवासरत है इसलिए दुर्ग ग्रामीण में सामान्य वर्ग को कमजोर आंकना राजनीतिक दलों की भूल होगी।कांग्रेस ने दुर्ग ग्रामीण के तीन चुनाव जहां दुर्ग ग्रामीण के स्थानीय निवासी को ही अवसर दिया वही भाजपा ने प्रथम चुनाव में स्थानीय दुर्ग ग्रामीण के ही निवासी प्रितपाल बेलचन्दन के बाद दोनो ही चुनावों में गुण्डरदेही से रमशिला साहू फिर धमधा से जागेश्वर साहू को आयात करके मौका दिया ।जिसमे जातिय समीकरण व कांग्रेस से प्रतिमा चंद्राकर को दूसरी पारी में विरोध के चलते हार का सामना करना पड़ा तथा रमशिला साहू ने जीत कर पांच साल रमन सरकार में महिला बाल विकास मंत्री के रूप में दुर्ग ग्रामीण का नेतृत्व किया।
दुर्ग ग्रामीण विधानसभा का 30 प्रतिशत भाग ग्रामीण परिवेश है तो 70 प्रतिशत भाग शहरी परिवेश है जो वर्तमान में नव गठित रिसाली निगम बना है ।क्षेत्र के विधायक प्रदेश सरकार में दूसरे नम्बर पर पावरफुल विभाग गृह, लोक निर्माण, पर्यटन, धर्मस्व ,विभाग के मंत्री भी है । बीते तीन सालों में हजारों करोड़ के काम रिसाली निगम सहित दुर्ग ग्रामीण में हुवे है ।बावजूद इसके रिसाली निगम में एकतरफा जीत का ख्वाब पाले ,बमुश्किल 40 में 21 सीटें पाकर निगम में कांग्रेस महापौर और सभापति बनाने में कामयाब हुई है। सरकार में होने के कारण निर्दलियों का झुकाव लाजमी है जिनके चलते निर्दलियों का समर्थन भी उन्हे प्राप्त है ।किंतु हजारों करोड़ों के काम के बाद भी प्राप्त वोटों का जोड़ यदि निकाला जाय तो कांग्रेस जहां 22 हजार के लगभग वोट पाने में कामयाब हुई है वहीं भाजपा भी 20 हजार वोटों के करीब है तथा निगम चुनाव में लगभग 17 हजार वोट बटोरकर निर्दलियों ने भी अपनी ताकत दिखा दी है ।जिससे यह स्पष्ट है की सत्ता के पक्ष में 22 हजार तो विपक्ष में लगभग 37 हजार वोट पड़े है जो इस बात की ओर इशारा करते है की डगर नही आसान इस बार दुर्ग ग्रामीण की
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एक मात्र नगर पंचायत उतई में कांग्रेस प्रत्याशी की हुई जमानत जप्त
रिसाली निगम के अलावा दुर्ग ग्रामीण की एक मात्र नगर पंचायत उतई के भी एक वार्ड में उप चुनाव हुवे थे जिसमे कांग्रेस के प्रत्याशी को ना मात्र 38 वोटों से संतुष्ट होना पड़ा बल्कि उनकी जमानत भी जप्त हो गई।
सरकार बनने के लगभग 2 साल बाद एल्डरमैन की नियुक्ति हुई रिसाली भिलाई सहित अन्य निगमों में चुनाव की घोषणा उपरांत उनमें से कुछ को टिकिट मिली कुछ जीते कुछ हारे। अब फिर एल्डरमैन की नियुक्ति का मामला ना सिर्फ रिसाली अपितु भिलाई चरौदा कुम्हारी अहिवारा सभी जगह अटका पड़ा है। जिसके चलते भी कार्यकर्ताओं में नाराजगी के स्वर फूटने लगे है जो दिखाई तो नही दे रहे किंतु चुनाव पूर्व कार्यकर्ताओं को मनाया नही गया तो यह विस्फोटक हो सकते हैं।
जहां तक पार्टी संगठन की बात है तो सत्तासीन पार्टी के संगठन का क्रियाकलाप किसी से छिपा नहीं होता।जिसका परिणाम भाजपा के सता के 15 वर्षों में आपको देखने मिला है।अब इसी राह पर कांग्रेस भी चल पड़ी है।निगम चुनाव पूर्व क्षेत्रीय नेतृत्व द्वारा डंका बजाया गया की जिन्हे चुनाव लडना है वो संगठन का पद छोड़ें किंतु कथनी और करनी में अंतर निरूपित करते बहुतों को बिना संगठन छोड़े टिकिट दे दी गई।कुछ जीते कुछ हारे किंतु ना जितने वालों ने ना हारने वालों ने संगठन का पद छोड़ा जिसके चलते भी सत्ता में होने के बाद भी जमीन से जुड़े कांग्रेस कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी उपज रही है।
ग्रामीण क्षेत्र में तोड़फोड़ से भी होगा कांग्रेस को नुकसान
दुर्ग ग्रामीण के नेतृत्व कर्ता ताम्रध्वज साहू लोक निर्माण मंत्री भी है तो लाजमी है की सड़कों का उद्धार तो होना ही है । दुर्ग ग्रामीण में सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है ।छोटे छोटे गांव के पहुंच मार्गों को भी स्टेट हाइवे की तरह चौड़ा किया जा रहा है किंतु ग्रामीण क्षेत्र में इस बात की नाराजगी आम लोगों में स्पष्ट झलक रही है की सड़क चौड़ीकरण में प्रभावितों को ना ही जमीन का मुआवजा दिया जा रहा ना ही तोड़े जा रहे निर्माण को सहेजने राहत पहुंचाई जा रही है जिससे ग्रामीण क्षेत्र में मध्यम व निम्न वर्गों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है ।पूर्व के दो साल करोना काल में लोगों की आर्थिक कमर जो टूट गई थी ।रही सही कसर लोक निर्माण विभाग ने पूरी कर दी।अधिकारी खुली गुंडागर्दी कर बिना भूमि सिमाकन के ना सिर्फ नोटिस जारी कर रहे बल्की तोड़ फोड़ करते नजर आ रहे किंतु सरकार में बैठे क्षेत्रीय विधायक के कान पर ना जूं रेंगी ना उन्हे कोई फर्क पड़ा बल्कि वो सत्ता सुख में पूरे डूबे नजर आ रहे।बीच बीच में ट्रेक सीजी न्यूज नहीं अपितु अन्य समाचारों के माध्यम से विभाग में भारी घोटालों की लपटें उठती गिरती नजर आई किंतु कोई फर्क नहीं पड़ा बल्कि घोटालों में शामिल जिन अधिकारियों का नाम सामने आया उन्हे विभाग ने प्रमोशन देकर उपकृत किया??आखिर इसके पीछे क्या खेला है यह तो कोई नही जानता किंतु यह तो स्पष्ट है की..डगर नही आसान दुर्ग ग्रामीण की
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क्या चुनाव पूर्व कांग्रेस अपने नाराज कार्यकर्ताओं को मनाने में सफल हो पाएगी
चुनावी वर्ष पूर्व बचे एक वर्ष में कांग्रेस के सत्तासीन व संगठन में बैठे नेता क्या अपने कार्यकर्ताओं को संतुष्ट कर पाएंगे या आगामी चुनाव में उन्हे इनकी नाराजगी झेलनी होगी यह तो वक्त ही बताएगा।
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भाजपा के लिए भी दुर्ग ग्रामीण आसान नहीं
भाजपा के नेताओं में अपने अपने वर्चस्व की लड़ाई आम हो चली है संगठन पर कब्जा एक ही नेता का रहा है इस बात के भी आरोप लगते रहे है ।किंतु खुले तौर पर छूट पुट कार्यकर्ताओं के बीच खींचा तानी भले दिखी हो।बड़े नेताओं में खुले रूप से नूरा कुश्ती देखने में नही आई ।किंतु भाजपा में भी भीतर ही भीतर निपटो निपटाओ को नकारा नहीं जा सकता।यह सब खेल तो टिकटों के वितरण के बाद ही स्पष्ट होगा की ऊंट किस करवट बैठता है।
किंतु मोदी और योगी के हिंदुत्व कार्ड को भी कमजोर नही आंका जा सकता साथ ही यह भी सुगबुगाहट है की उत्तरप्रदेश की तर्ज पर ना सिर्फ भाजपाइयों को अपितु सामाजिक ,सांस्कृतिक ,खेल ,पत्रिकारिता ,के क्षेत्र से जुड़े नए चेहरों को आगे लाकर भाजपा सभी को चौंका सकती है।
फिर भी यह सत्य है की
डगर नही आसान दुर्ग ग्रामीण की
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आप की भी धमाकेदार एंट्रीकमजोर समझना कही पड ना जाए भारी*
दिल्ली के बाद एक तरफा पंजाब में जीत हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल अति उत्साहित है और उन्होंने आने वाले विधान सभा चुनावों में छत्तीसगढ़ में भी चुनाव लडने का ऐलान ए जंग कर चुके है। और एक धमाकेदार एंट्री के रूप में योग्यता का सम्मान करते दिल्ली आई आई टी के प्रोफेसर छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिला लोरमी ब्लॉक के एक गांव के निवासी संदीप पाठक को राज्यसभा में भेजने का फैसला कर उन्होंने योग्यता का सम्मान करते हुए छत्तीसगढ़ में एंट्री कर ली है आगामी चुनाव में संदीप पाठक छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी का एक बड़ा चेहरा हो सकते है ।
आप की एंट्री से पढ़े लिखे उच्च व मध्यम वर्ग का झुकाव उस और हो सकता है ।ऐसी स्थिति में इसका नुकसान कांग्रेस को होगा या भाजपा को यह तो वक्त ही बताएगा लेकिन यह भी संभव है की पंजाब भाजपा कांग्रेस अकाली से नाराज लोगों ने आम आदमी पार्टी को हाथो हाथ लिया है उसी तरह छत्तीसगढ़ में भी भाजपा कांग्रेस दोनो ही दलों का कार्यकाल देखने के बाद बुद्धिजीवी वर्ग आम आदमी पार्टी के साथ जुड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होगा।
जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जोगी की भी रहेगी उपस्थिति
छत्तीसगढ़ की एक मात्र मान्यता प्राप्त छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस जोगी भी चुनाव मैदान में हो सकती है..प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री रहे अजीत जोगी का प्रदेश के अनुसूचित जाति जन जाति के लोगों से सीधा जुड़ाव रहा है ।अजीत जोगी के रहन सहन खान पान और आमजनता से मिलने बात करने का जो सलीका रहा है वो आज भी उस वर्ग के लोगों के दिलो दिमाग में है जिसके कारण ही अजीत जोगी के निधन के बाद भी अमित जोगी से लोग जुड़े हुवे है ।चुनाव के वक्त अमित जोगी की रणनीति क्या होगी ये तो वक्त बताएगा किंतु क्षेत्र का एक बहुत बड़ा अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय उनसे जुड़ा हुआ है इसलिए जोगी कांग्रेस की उपस्थिति को भी नकारा नहीं जा सकता।
