✍? रिपोर्टर विक्रम कुमार नागेश गरियाबंद
गरियाबंद। क्या सरकारी दस्तावेजो के बैगर इंसान की कोई कीमत नही, क्या सरकारी दस्तावेजों के बैगर इंसान को बुनियादी सुविधाओं का भी अधिकार नही। ये सवाल आज हम इसलिए उठा रहे है कि लाईलाज बीमारी से जूझ रही एक 8 साल की मासूम बच्ची बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही है क्योकि उसके पास जरूरी सरकारी दस्तावेज नही है। आधारकार्ड नही होने के कारण उसका सरकारी योजना के तहत इलाज नही हो पा रहा है ओर परिवार इलाज कराने में सक्षम नही है। इसी कारण उसका राशनकार्ड में नाम नही जुड़ पाया और ना ही दिव्यांग पेंशन मिल रही है। लाचार गरीब परिवार ने अब बेटी को अपने हाल पर छोड़ दिया है।
दरअसल ये पूरा मामला मैनपुर ब्लॉक के भरुवामुड़ा गांव का है। गांव के चंद्रशेखर और चितेमनी की 8 वर्षीय बेटी बिंदिया अज्ञात बीमारी से जूझ रही है। बिंदिया ना तो बिस्तर से उठ पाती है और ना ही बोल पाती है। वह बिस्तर पर ही लेटी रहती है। परिजनों के मुताबिक वह जन्म से ही ऐसी स्थिति में है।
पिता चंद्रशेखर ने प्रेस वार्तालाप पर न्यूज़ 24 कैरेट संवाददाता को बताया कि मजदूरी करके वह अपने परिवार का पालन पोषण करता है। उसने अपनी हैसियत के मुताबिक आसपास के अस्पतालों में बेटी का इलाज कराया मगर कोई फायदा नही मिला। चंद्रशेखर ने आगे बताया कि वह अब अपनी सारी जमापूंजी बेटी के इलाज में खर्च कर चुका है। लेकिन बेटी की सेहत में कोई सुधार नही आया। डॉक्टर उसे बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह देते है। आर्थिक तंगी के कारण वह ऐसा नही कर पा रहा है।
उन्होंने आगे यह भी बताया कि बेटी का आधारकार्ड नही होने के कारण सरकारी योजना से इलाज नही हो पा रहा है। राशनकार्ड से भी उसका नाम काट दिया गया है। दिव्यांग पेंशन भी नही मिल पा रही है। थक चुके बाप ने अब बेटी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया है। माँ चितेमनी उसकी देखभाल करती है।
8 साल यानी अपने जन्म से लेकर आजतक बिस्तर पर लेटी बिंदिया के मामले ने सरकारी सिस्टम को ही खाट पर लाकर खड़ा कर दिया है। तमाम जनकल्याणकारी योजनाएं संचालित होने के बाद भी बिंदिया को उसका लाभ नही मिल पाया। ताज्जुब की बात ये है कि अंतिम पंक्ति में बैठे अंतिम व्यक्ति तक योजना का लाभ पहुंचाने का दावा करने वाली सरकार बिंदिया को लाभ पहुंचाने में कैसे चूक गयी। योजनाओं में खोट है या फिर योजनाएं संचालित करने वाले अफसरशाही की नीयत में खोट है।
स्थानीय प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियो एवं समाज के ठेकेदारों से ये सवाल अवश्य पूछा जाएगा कि 8 साल से बिंदिया की बेबशी की पुकार सुनने में वे कैसे चूक गए।
