श्राद्ध कैसे करे ? श्राद्ध क्या है ?


(पं•कृष्ण कुमार तिवारी )

पितरों के उद्देश्य से विधि-विधानपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है , उसे श्राद्ध कहते है-
श्रद्धया पितृन उद्दिश्य विधिना क्रियते यत्कर्म तत् श्राद्धम् ।
श्रद्धा से ही श्राद्ध शब्द बना है ।
श्रद्धा अर्थमिदं श्राद्धम्।
अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से श्रद्धापूर्वक किये जानेवाले कर्म विशेष को श्राद्ध शब्द नाम से जाना जाता है ।
इसे ही पितृयज्ञ भी कहते है ।।
जिसका वर्णन मनुस्मृति, पुराणो , श्राद्ध दर्पण , श्राद्ध कल्पलता, श्राद्ध तत्व , पितृदयिता आदि अनेक ग्रंथो से प्राप्त होता है ।।

जो प्राणी जो प्राणी विधि पूर्वक शांत मन होकर श्राद्ध करता है वह सभी पापों से रहित होकर मुक्ति को प्राप्त होता है तथा फिर संसार चक्र में नहीं आता अतः प्राणी को पितृगण की संतुष्टि तथा अपने कल्याण के लिए भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। इस संसार में और कोई श्राद्ध करने वाले के लिए कल्याण कारक उपाय नहीं है इस तथ्य की पुष्टि महात्माओ के द्वारा की गई है इस जगत में श्राद्ध से श्रेष्ठ अन्य कोई कल्याण प्रद उपाय नहीं है अतः बुद्धिमान मनुष्य को यत्न पूर्वक श्राद्ध करना चाहिए इतना ही नहीं श्राद्ध करने से श्रद्धा कर्ता का कल्याण ही होता है , पितृदोष आदि से मुक्ति प्रदान करता है , इसलिए श्राद्ध से अन्य कोई कल्याण कारक उपाय मनुष्य के पास नही है ।

श्राद्ध संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी


(पं•कृष्ण कुमार तिवारी)
इस वर्ष श्राद्ध पर्व दिनांक 21-09-2021 मंगलवार आश्विन शु•प• प्रतिपदा से प्रारंभ हो रहा है , जिसे छ्त्तीसगढ के आम भाषा मे पितर बैठकी कहा जाता है ,
जिस परिवार मे किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा तिथि मे हुई है उस परिवार वाले का पितर बैठकी 20-09-2021 सोमवार भाद्र शु•प• के पूर्णिमा से प्रारंभ हो जायेगे ।।
पूर्णिमा तिथि मे प्राण त्यागने वाले पितरो का श्राद्ध , भाद्र पूर्णिमा मे करना चाहिए। ।
शेष आश्विन कृ•प• प्रतिपदा से प्रारंभ कर सकता है ।।

आइये जानते है , श्राद्ध से संबधित महत्वपूर्ण बाते ।।?

● पूर्णिमा तिथि के दिन किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो, तो उन परिवार वालो को भाद्र शु•प• पूर्णिमा तिथि से ही पितर बैठकी (पितृ श्राद्ध) प्रारंभ करना चाहिए ।।

● गया श्राद्ध करने के बाद भी अपने पितरो को श्राद्ध तर्पण करना बंद नही करना चाहिए , अर्थात श्राद्ध तर्पण करते रहना चाहिए।

● जिस पितर के वार्षिक श्राद्ध (अर्थात मृत्यु समय एक वर्ष नही बिता है ) उन पितरो को छोड कर शेष सभी पितरो को पितृ पक्ष मे श्राद्ध तर्पण करना चाहिए, ये भ्रमात्मक प्रचार है , कि परिवार मे किसी के मृत्यु हो जाने के बाद इस वर्ष पितर श्राद्ध तर्पण नही करना चाहिए ।।

● किसी भी व्यक्ति का श्राद्ध तर्पण उनके मृत्यु तिथि मे ही करना चाहिए,मृत्यु तिथि का अभिप्राय अंतिम सांस तिथि से ,न कि दाह संस्कार तिथि मे करना चाहिए।

● पितृ मिलन (पितर मिलाना) श्राद्ध स्त्री हो या पुरुष प्रथम बार तिथि मे ही मिलाना चाहिए, उसके बाद हर वर्ष स्त्रियो को हमेशा नवमी मे मानना चाहिए।

● सभी पुत्रो को श्राद्ध तर्पण करने का अधिकार है , ये भ्रमात्मक प्रचार है बडा भाई कर रहा है तो छोटे भाई को श्राद्ध तर्पण करना आवश्यक नही है ,
अर्थात बडा, (मध्य) मझला, छोटा , सभी पुत्रो को श्राद्ध तर्पण करना चाहिए। ।

● किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि ज्ञात नही है ,तो उस व्यक्ति को अमावस्या तिथि को मानना चाहिए
अर्थात उसके लिए अमावस्या तिथि के दिन श्राद्ध तर्पण करना चाहिए।।

● पितर का तिथि किसी भी दिन आये परंतु पितर बैठकी से पितर विसर्जन तक हर दिन , दरवाजा के सामने चौक बनाकर , फूल , इत्यादि रखकर पितरो का स्वागत करना चाहिए , हर दिन तर्पण भी करना चाहिए ।।

● पितरो का आसन मे श्वेत वस्त्र का उपयोग करना चाहिए,व उनका चित्र , मूर्ति इत्यादि उत्तर मुख रखना चाहिए , पूजा करने वाला का मुख दक्षिण तरफ होना चाहिए।।

● भगवान श्री नारायण को तुलसी , श्रीगणेश को दुर्वा (दुबी) , श्री शिव जी को बेल (विल्व) , प्रिय है , उसी प्रकार पितरो को भृंगराज (भैगरैय्या) पत्र प्रिय है , अर्थात पितरो को भृंगराज का पत्र पुष्प अवश्य चढाना चाहिए। ।

● मेरे पितर शराब व मांस खाते थे ,ऐसा सोच कर जो अपने पितर को मांस या शराब अर्पण करता है वह व्यक्ति स्वयं तो नरक मे जायेगा ,और अपने पितरो को भी नरक मे ले जायेगा ,
अतः पितरो को सात्विक भोजन ही अर्पण करना चाहिए। ।

● पितरो के पूजा मे लाल व काला रंग का फूल व बेल पत्र वर्जित है ।।
सफेद रंग का फूल अति उत्तम माना गया है , अभाव मे पीला रंग का फूल ग्रहण करना चाहिए।।

● शारीरिक परेशानी व अस्वस्थ्यता के कारण श्राद्ध तर्पण न कर सकने वाले श्राद्ध तर्पण कर्ता को , पुरोहित ब्राम्हण को भोजन खिलाना चाहिए, किसी कारण वश ब्राम्हण घर आने मे असमर्थ है तो उनके घर जाकर गृहस्थ उपयोगी सामाग्री दान करना चाहिए, इसे
भी श्राद्ध माना जाता है ।।

● देवताओ के लिए पूर्व व उत्तर मुख , पितरो के लिए
दीपक दक्षिण मुख जलाना चाहिए,

● देवताओ को अनामिका अँगुली से और पितरो को तर्जनी अँगुली से चंदन , गुलाल , इत्यादि का टीका लगाना चाहिए। ।

● श्राद्ध तर्पण मे काला नीला रंग का वस्त्र नही पहनना चाहिए, श्वेत वस्त्र उत्तम माना गया है ।।

● श्राद्ध मे ब्राम्हणो को , बैठाकर पैर धोना चाहिए, खडे होकर पैर धोने से पितर निराश हो जाते है ।।

● पितृ पक्ष मे देवी , देवताओ, की पूजा पाठ नही करना चाहिए ये भी एक भ्रमात्मक प्रचार है , अर्थात नित्य जो घर मे पूजा पाठ , धूप , दीप , जलाकर पूजा करते है , उन्हे कभी बंद नही करना चाहिए , अर्थात पितृ पक्ष मे देवताओ की पूजा पाठ करते रहना चाहिए ।

● मेरे पितर लोग, मदिरापान करते थे , गुडाखू मंजन करते थे ,बीडी सिगरेट पीता था , मांस खाता था , तो मुझे वैसे ही वस्तु का दान
पितरो के निमित्त, ब्राह्मणो को दान करना चाहिए, ऐसा सोचना भी पाप है ,भूल से भी इन वस्तुओ का दान नही करना चाहिए , अर्थात सात्विक आहार वस्तु का ही दान करना चाहिए ।।

आइये जाने पितृ पक्ष मे किस प्रकार श्राद्ध करना चाहिए।

तर्पण विधि
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(पं•कृष्ण कुमार तिवारी)〰️
(देव, ऋषि और पितृ सम्पूर्ण तर्पण विधि)
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।।ॐ अर्यमा न त्रिप्य्ताम इदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।…ॐ मृत्योर्मा अमृतं गमय।।

पितरों में अर्यमा श्रेष्ठ है। अर्यमा पितरों के देव हैं। अर्यमा को प्रणाम। हे! पिता, पितामह, और प्रपितामह। हे! माता, मातामह और प्रमातामह आपको भी बारंबार प्रणाम। आप हमें मृत्यु से अमृत की ओर ले चलें।

क्या है तर्पण
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पितरों के लिए श्रद्धा से किए गए मुक्ति कर्म को श्राद्ध कहते हैं तथा तृप्त करने की क्रिया और देवताओं, ऋषियों या पितरों को तंडुल या तिल मिश्रित जल अर्पित करने की क्रिया को तर्पण कहते है।

देवऋषि पितृ तर्पण विधि
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तर्पण के प्रकार
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पितृतर्पण,
ऋषितर्पण
मनुष्यतर्पण,
देवतर्पण,
भीष्मतर्पण,

तर्पण विधि
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सर्वप्रथम पूर्व दिशा की और मुँह कर,दाहिना घुटना जमीन पर लगाकर,सव्य होकर(जनेऊ व् अंगोछे को बांया कंधे पर रखें) गायत्री मंत्र से शिखा बांध कर, तिलक लगाकर, दोनों हाथ की अनामिका अँगुली में कुशों का पवित्री (पैंती) धारण करें । फिर हाथ में त्रिकुशा ,जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प पढें—

ॐ विष्णवे नम: ३। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये ।

तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें-

ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः।

तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसीदल रखें, फिर उस पात्र में तर्पण के लिये जल भर दें । फिर उसमें रखे हुए त्रिकुशा को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढँक लें और देवताओं का आवाहन करें ।

आवाहन मंत्र : ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम् । एदं वर्हिनिषीदत ॥

‘हे विश्वेदेवगण ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजे ।

इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और त्रिकुशा द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि तिल चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाममन्त्र पढते रहें—

1.देवतर्पण:
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ॐ ब्रह्मास्तृप्यताम् ।

ॐ विष्णुस्तृप्यताम् ।

ॐ रुद्रस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम् ।

ॐ देवास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ वेदास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ संवत्सररू सावयवस्तृप्यताम् ।

ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ नागास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सागरास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सरितस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतानि तृप्यन्ताम् ।

ॐ पशवस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम् ।

ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम् ।

2.ऋषितर्पण
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इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एक-एक अञ्जलि जल दें—

ॐ मरीचिस्तृप्यताम् ।

ॐ अत्रिस्तृप्यताम् ।

ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम् ।

ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम् ।

ॐ पुलहस्तृप्यताम् ।

ॐ क्रतुस्तृप्यताम् ।

ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम् ।

ॐ प्रचेतास्तृप्यताम् ।

ॐ भृगुस्तृप्यताम् ।

ॐ नारदस्तृप्यताम् ॥

3.मनुष्यतर्पण•••••••●•••••••〰️〰️
उत्तर दिशा की ओर मुँह कर, जनेऊ व् गमछे को माला की भाँति गले में धारण कर, सीधा बैठ कर निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि जौ सहित जल प्राजापत्यतीर्थ (कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें—

ॐ सनकस्तृप्यताम् -2

ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् – 2

ॐ सनातनस्तृप्यताम् -2

ॐ कपिलस्तृप्यताम् -2

ॐ आसुरिस्तृप्यताम् -2

ॐ वोढुस्तृप्यताम् -2

ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् -2

4.पितृतर्पण
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दोनों हाथ के अनामिका में धारण किये पवित्री व त्रिकुशा को निकाल कर रख दे ,

अब दोनों हाथ की तर्जनी अंगुली में नया पवित्री धारण कर मोटक नाम के कुशा के मूल और अग्रभाग को दक्षिण की ओर करके अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखे, स्वयं दक्षिण की ओर मुँह करे, बायें घुटने को जमीन पर लगाकर अपसव्यभाव से (जनेऊ को दायें कंधेपर रखकर बाँये हाथ जे नीचे ले जायें ) पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृतीर्थ से (अंगुठा और तर्जनी के मध्यभाग से ) दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें—

ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

ॐ अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3

ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3

ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम: – 3

5.यमतर्पण
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इसी प्रकार निम्नलिखित मन्त्रो को पढते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें—

ॐ यमाय नम: – 3

ॐ धर्मराजाय नम: – 3

ॐ मृत्यवे नम: – 3

ॐ अन्तकाय नम: – 3

ॐ वैवस्वताय नमः – 3

ॐ कालाय नम: – 3

ॐ सर्वभूतक्षयाय नम: – 3

ॐ औदुम्बराय नम: – 3

ॐ दध्नाय नम: – 3

ॐ नीलाय नम: – 3

ॐ परमेष्ठिने नम: – 3

ॐ वृकोदराय नम: – 3

ॐ चित्राय नम: – 3

ॐ चित्रगुप्ताय नम: – 3

पं• कृष्ण कुमार तिवारी

6.मनुष्यपितृतर्पण
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इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें—

ॐ आगच्छन्तु मे पितर एवं ग्रहन्तु जलान्जलिम’

ॐ हे पितरों! पधारिये तथा जलांजलि ग्रहण कीजिए।

‘हे अग्ने ! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं । यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं । हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ ।’

तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल-सहित जल इस प्रकार दें—

अस्मत्पिता अमुकशर्मा वसुरूपस्तृप्यतांम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अस्मत्पितामह: (दादा) अमुकशर्मा रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अस्मत्प्रपितामह: (परदादा) अमुकशर्मा आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम: – 3

अस्मन्माता अमुकी देवी वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3

अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम: – 3

अस्मत्प्रपितामही परदादी अमुकी देवी आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जल तस्यै स्वधा नम: – 3

इसके बाद नौ बार पितृतीर्थ से जल छोड़े।

इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे—

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा: । पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा: ॥

जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव: । प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला: ॥

नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता: । तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया ॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: । ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण: ॥

अर्थ : ‘देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्षवर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहनेवाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों । जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ । जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों, अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो मुम्कसे जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों ।’

ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा: । तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय: ॥

अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् । आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥

येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा: ।ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा ॥

अर्थ : ‘ब्रह्माजी से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्मलोकपर्यम्त सात द्वीपों के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिलमिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ ।

वस्त्र-निष्पीडन करे तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेटकर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र : “ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृतारू । ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम् ” को पढते हुए अपसव्य होकर अपने बाएँ भाग में भूमिपर उस वस्त्र को निचोड़े । पवित्रक को तर्पण किये हुए जल मे छोड दे । यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये ।

7.भीष्मतर्पण :
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इसके बाद दक्षिणाभिमुख हो पितृतर्पण के समान ही अनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बालब्रह्मचारी भक्तप्रवर भीष्म के लिये पितृतीर्थ से तिलमिश्रित जल के द्वारा तर्पण करे । उनके लिये तर्पण का मन्त्र निम्नाङ्कित श्लोक है–

“वैयाघ्रपदगोत्राय साङ्कृतिप्रवराय च । गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम् । अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे ॥”

अर्घ्य दान:
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फिर शुद्ध जल से आचमन करके प्राणायाम करे । तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्य कर एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसमे श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे । फिर दूसरे पात्र में चन्दन् से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे ।

अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं—
〰️〰️〰️〰️ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि ॥

ॐ विष्णवे नम: । विष्णुं पूजयामि ॥

ॐ रुद्राय नम: । रुद्रं पूजयामि ॥

ॐ सवित्रे नम: । सवितारं पूजयामि ॥

ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि ॥

ॐ वरुणाय नम: । वरूणं पूजयामि ॥

पं• कृष्ण कुमार तिवारी

फिर भगवान सूर्य को अघ्र्य दें –इस सरल मंत्र से ?

ऊं सूर्यायः नमः ।।
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फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें।

ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः।
ॐ आग्नयै अग्नयै नमः।
ॐ दक्षिणायै यमाय नमः।
ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः।
ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः।
ॐ वायव्यै वायवे नमः।
ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः।
ॐ ऐशान्यै ईशानाय नमः।
ॐ ऊध्र्वायै ब्रह्मणै नमः।
ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः।

इस तरह दिशाओं और देवताओं को नमस्कार कर बैठकर नीचे लिखे मन्त्र से पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें।

ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो नमः। ॐ अपांपतये नमः। ॐ वरूणाय नमः।

फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार ॐ अच्युताय नमः मंत्र का जप 12,21,या 108 बार करे।।

समर्पण- उपरोक्त समस्त तर्पण कर्म भगवान को समर्पित करें।

ॐ तत्सद् कृष्णार्पण मस्तु।

नोट- यदि नदी में तर्पण किया जाय तो दोनों हाथों को मिलाकर जल से भरकर गौ माता की सींग जितना ऊँचा उठाकर जल में ही अंजलि डाल दें।

पं• कृष्ण कुमार तिवारी
(श्रीमद्भागवताचार्य)
पाटन , जिला-दुर्ग (छ•ग•)
फोन – 9425568015

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