युवाओ को दिया संदेश, खेती भी है एक बड़ा व्यवसाय परम्परागत खेती से हटकर खेती से होता है लाभ

राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ राज्य जिसे “धान का कटोरा” के नाम से जाना जाता है जहां अलग अलग किस्मों के धान बोये जाते है। इसी राज्य के राजनान्दगाँव जिले का डोगरागढ़ ब्लॉक जो प्राचीन काल से पारंपरिक विधि से खेती के नाम से जाना जाता है जहां विभिन प्रकार के फसल का उत्पादन लिया जाता है।

यहाँ के किसान मुखयतः खेती पर निर्भर रहते है मुखयतः यहाँ पर धान की खेती की जाती है यहाँ पर दोमट और काली मिट्टी पायी जाती है जो खेती के लिए अत्यंत लाभकारी होती है। किसान के पास सिंचाई की पर्याप्त सुविधा ना होने के कारण मुखयतः खरीफ के ही खेती कर पाते है खरीफ मे मुखयतः धान, सोयाबीन, अरहर की फसल ली जाती है और जिस किसानो के पास सिंचाई की व्यवस्था होती है वे किसान रबी मे सब्जी, गेहूं और चना इत्यादि की खेती करते है।

हृदय मांडवी नाम का किसान जो मेढ़ा नामक गाँव मे रहता है जिनकी उम्र 39 वर्ष की है, किसान पूरी तरह से खेती पर निर्भर है खेती किसानी कर के अपने परिवार का पालन पौषण करते है, हृदय मांडवी की पढ़ाई 12वी तक ही हुयी परिवार की जल्दी जिमेदारी मिलने के कारण आगे की पढ़ाई नहीं कर पाये और किसानी करना शुरू कर दिये। किसान के परिवार मे पत्नी, 3 बच्चे और स्वं रहते है, हृदय मांडवी के पास 16 एकड़ जमीन है जिसमे वो पारंपरिक रूप से खेती करते है, जिससे लागत के साथ अच्छी उपज भी प्राप्त नहीं होती थी।

हृदय मांडवी एक बार अपने मित्र के खेत मे जिमिकन्द की खेती करते हुये देखा जिनसे ये प्रेरित हो कर अपने एक एकड़ मे जिमिकन्द लगाने का विचार किए लेकिन सही जानकारी ना होने के कारण बहुत ही असमंजस पड़ गए क्योंकि इसके पहले उन्होने जिमिकन्द की खेती नहीं की थी। कोरोना का समय चल रहा था किसान को जानकारी इकट्ठा करने मे बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ा, उसी समय किसान को जानकारी मिली की रिलायंस फ़ाउंडेशन द्वारा एक दिवसीय ट्रेनिंग प्रोग्राम रखा गया है लेकिन कोरोना मे ट्रेनिंग किस तरह से होगा ये सोच मे पड़ गया, फिर उन्होने अपना मोबाइल नंबर दर्ज कराया जिससे उनको एक आडिओ कॉन्फ्रेंस मे समिलित किया गया। जिसमे किसान ने प्रश्न किया की एक एकड़ मे जिमिकन्द का गजेंद्र किस्म लगा है और पौधे का विकास नहीं हो रहा है इसका उपचार बताए, फिर कृषि विज्ञान केंद्र- सुरगी राजनांदगाँव से डॉ अंजलि गृतलहरे ने किसान को बताया की आप जो जिमिकन्द लगाए है ये किस्म इंदरा गांधी कृषि विश्व विदयालय रायपुर द्वारा अनुशांधित किस्म है जिसका नाम गजेंद्र है इसमे गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट डाले जिससे विकास भी अच्छा होगा और जैविक खेती भी कर सकते है, साथ ही आस पास उगे हुये खरपतवार को भी निंदाई करे और जरूरत पड़े तो खाद देने बाद सिंचाई भी करे।

उपरोक्त बताए जानकारी अनुसार किसान ने अपने खेत मे प्रयोग किया और एक एकड़ से 36 कुंटल जिमिकन्द का उत्पादन लिया व 40 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा और 55000 रुपए बोवाई से लेकर कटाई तक खर्चा आया साथ ही सभी खर्चे को कट कर 89000 शुद्ध मुनाफा प्राप्त किया।

हृदय मांडवी ने कहा की “जिमिकन्द की खेती मे मुझे मुनाफा हुआ और पैसे जोड़ कर मैंने एक एकड़ जमीन ली और जिसमे मछली पालन का कार्य कर सके और युवाओ को संदेश दिये की नौकरी के ही पीछे न जा कर अपने पूर्वज की खेती को आगे बढ़ाए, आधुनिक खेती करे और अधिक से अधिक मुनाफा कमा कर अपना सपना पूरा करे, साथ ही इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए रिलायंस फ़ाउंडेशन और कृषि विज्ञान केंद्र सुरगी को धन्यवाद दिया।“

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