? विक्रम कुमार नागेश गरियाबंद ब्यूरो
मैनपुर। विकासखंड मुख्यालय गरियाबंद से 27 किलोमीटर की दूरी पर बसा ग्राम पंचायत बेगरपाला के आदिम जनजाति बाहुल्य आश्रित ग्राम टीमनपुर मे आर्थिक हालत से मजबूर तंगहाली के जिंदगी जीते हुए भूखे मरने की कगार पर पहुंचा आदिम जनजाति रमेश कुमार कमार उम्र 40 वर्ष को कोविड-19 के चलते घर मे छोटे बच्चे को छोड़कर विगत 7 महीनों से कहीं नहीं जाने के कारण आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई है। जिसके कारण अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ तंगहाली से जीवन जीने को मजबूर है । ज्ञात हो,कि विगत 4 जनवरी 2020 को उनकी पत्नी गणेश्वरी बाई का अज्ञात बीमारियों के चलते मृत्यु हो गई। उस समय उसके 5 बेटों में से सबसे छोटे बेटा की उम्र महज डेढ़ साल का था। बिना मां के किस हाल में छोटा अबोध बालक जी रहा होगा। उस बच्चे की हालत को देखकर कठोर दिल वालों का भी दिल पिघल जाएगा। अबोध बालक भयंकर कुपोषित होने के साथ ही अत्यंत कमजोर होने के कारण चल भी नहीं पा रहा है। जहां पर लेटे रहता है। वहीं पर ही रहने को मजबूर है। लगता है जैसे अबोध बालक मौत को नजदीक से देख रहा हो। रमेश कुमार ने बताया कि पत्नी के गुजर जाने के बाद उसे 5 बच्चों की परवरिश की चिंता हर दिन सता रहा है। आर्थिक स्थिति भयंकर खराब होने के बाद भी छोटे अबोध बालक को छोड़कर कहीं नहीं जा सकता और किसी के भरोसे भी नहीं छोड़ा जा सकता। क्योंकि मेरे बड़े लड़का 13 साल वह भी मंदबुद्धि होने के चलते और भी परेशानी झेल रहा हूं। परिवार में कुल 5 बच्चे हैं। बच्चों की पालन पोषण कैसे हो पाएगी। चिंता रात दिन सता रही है।यदि बच्चों के लिए कुछ जुगाड़ करने के लिए जाता हूँ। तो अबोध बच्चे को रखने वाला परिवार में कोई नहीं है। क्षेत्र भ्रमण में पहुंचे समाजसेवी रोहिदास यादव धवलपुर को जानकारी होने पर रमेश कुमार ने उन्हें अपने परिवारिक हालात के बारे में बताया कि मेरे पत्नी को गरियाबंद हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था पर बचा नहीं पाया। परिवार में आधा एकड़ जमीन को भी 10 साल के लिए गिरवी रखते हुए पत्नी के इलाज में खर्चा करने के बाद भी चली गई। छोटे-छोटे बच्चों का परवरिश कैसे कर पाऊंगा यही चिंता सता रहा है। समाजसेवी रोहिदास यादव ने बताएं कि रमेश कुमार के घर जाने पर छोटे बच्चे हेमराज डेढ़ वर्ष को जमीन में लिटा दिया गया था। अत्यधिक कमजोर होने के कारण बच्चा रो नहीं पा रहा था। तत्काल मेरे द्वारा बच्चे के लिए बिस्किट व्यवस्था कर खिलाया गया। जिसे लेटे लेटे ही खाने लगा। कोविड-19 के समय में भी इन परिवारों को सरकारी मदद नहीं मिलने के कारण भयंकर आर्थिक परेशानी से जो जीते हुए शासन प्रशासन एवं स्वयंसेवी संगठनों से छोटे अबोध बच्चों के परवरिश में मदद करने की मांग किया है।
