पाटन। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार दुर्ग ग्रामीण एवं पाटन क्षेत्र के उतई, गाड़ाडीह, कुम्हारी और पाटन सहित आसपास के इलाकों में संचालित कई आरा मिलों में अर्जुन प्रजाति के पेड़ों की लकड़ी का कथित तौर पर बड़े पैमाने पर कारोबार किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि इन आरा मिलों में अर्जुन लकड़ी की आवक और चिराई का काम जारी है। यदि यह कारोबार बिना वैध अनुमति के हो रहा है, तो यह वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सवाल यह है कि आखिर अर्जुन प्रजाति की लकड़ी किन स्रोतों से आरा मिलों तक पहुंच रही है? इसके परिवहन की अनुमति किसके द्वारा जारी की जा रही है? क्या आरा मिल संचालकों के पास लकड़ी के खरीदी-बिक्री और भंडारण से संबंधित वैध दस्तावेज उपलब्ध हैं?
क्या कागजों में हो रहा है लकड़ी का हिसाब-किताब?
मामले की निष्पक्ष जांच होने पर लकड़ी के वास्तविक स्रोत, परिवहन अनुमति, स्टॉक रजिस्टर और चिराई रिकॉर्ड की स्थिति स्पष्ट हो सकती है। अब देखना होगा कि वन विभाग इन सूचनाओं को कितनी गंभीरता से लेता है और संबंधित आरा मिलों की जांच के लिए क्या कार्रवाई करता है।
जांच की मांग: उतई, गाड़ाडीह, कुम्हारी और पाटन क्षेत्र की सभी संबंधित आरा मिलों के स्टॉक एवं दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
रोज सुबह होता है लकड़ी का परिवहन, आखिर किसकी निगरानी में पहुंच रही आरा मिलों तक अर्जुन की लकड़ी?
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उतई, गाड़ाडीह, कुम्हारी और पाटन क्षेत्र की कई आरा मिलों में अर्जुन प्रजाति की लकड़ी का कथित कारोबार चल रहा है। बताया जा रहा है कि इन क्षेत्रों में रोज सुबह लकड़ी का परिवहन किया जाता है और इसके बाद आरा मिलों में चिराई की जाती है। यदि यह परिवहन बिना वैध अनुमति के हो रहा है, तो यह वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सुबह-सुबह होने वाले इस परिवहन पर संबंधित विभाग की नजर क्यों नहीं पड़ रही है? लकड़ी कहां से लाई जा रही है, परिवहन के लिए कौन से दस्तावेज हैं और आरा मिलों में इसका कितना स्टॉक मौजूद है? इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी है।
