सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित, फिर भी भुगतान—सहकारिता विभाग में खुला खेल और बड़े लेन-देन की बू



रायपुर।प्रदेश का सहकारिता विभाग आज खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहा है। इंक्रीमेंट भुगतान के मामले में जो तथ्य सामने आए हैं, वे न केवल प्रशासनिक अराजकता बल्कि बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और संरक्षणवाद की ओर इशारा करते हैं।
इंक्रीमेंट से संबंधित मामला पहले ही छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय बिलासपुर में कर्मचारियों के पक्ष में आ चुका है। इसके बावजूद स्वयं छत्तीसगढ़ शासन ने इस निर्णय को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है, जहां मामला अभी भी विचाराधीन है।
इस पूरे मामले में 13/11/2025 को संयुक्त आयुक्त सहकारिता, बस्तर संभाग, जगदलपुर द्वारा जारी आधिकारिक पत्र भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है। उक्त पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि शासन द्वारा दायर SLP (C) 032232/2025 सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है और अंतिम निर्णय के बाद ही वेतन वृद्धि एवं महंगाई भत्ते के संबंध में कार्यवाही की जाएगी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्वयं विभाग का अधिकृत पत्र यह कह रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद ही कार्रवाई होगी, तो फिर जगदलपुर जिला सहकारी बैंक में इंक्रीमेंट का भुगतान किस आधार पर और किस दबाव में किया गया?
जगदलपुर बैंक के अध्यक्ष, जो सहकारिता मंत्री के करीबी रिश्तेदार हैं, और सहकारिता मंत्री के ओएसडी तथा सहकारिता विभाग के अधिकारियों की भूमिका इस पूरे प्रकरण में गंभीर संदेह के घेरे में है। यह पूरा घटनाक्रम साफ तौर पर संकेत देता है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित होने के बावजूद भुगतान कराने के पीछे भारी-भरकम लेन-देन हुआ है।
इसी तरह का मामला रायपुर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक में भी लंबित है, जिससे वहां के प्रबंधन के सामने बड़ी दुविधा खड़ी हो गई है—क्या वे कानून और न्यायालय का सम्मान करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करें या फिर जगदलपुर की तरह नियमों को ताक पर रखकर भुगतान कर दें?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता स्वयं सहकारिता विभाग छत्तीसगढ़ शासन है, और वर्तमान में भुगतान की अनुमति देने वाले भी शासन के ही सहकारिता विभाग हैं। यानी एक ही शासन दोहरी भूमिका निभा रहा है—एक ओर कोर्ट में मामला लंबित रखकर न्यायिक प्रक्रिया को उलझाना, और दूसरी ओर मनमाने तरीके से भुगतान की अनुमति देना।
यह पूरा मामला सहकारिता विभाग में “खुला खेल फर्रुखाबादी” का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।
अब प्रदेश की जनता और कर्मचारी यह जानना चाहते हैं कि आखिर नियम और कानून का पालन होगा या फिर रिश्तेदारी और लेन-देन के आधार पर फैसले होते रहेंगे?

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