- कमार–भुंजिया जनजाति के ‘दत्तक पुत्र’ सुरक्षित स्कूल भवन को आज भी तरसते, विभाग चार महीने से बेखबर
रोशन लाल अवस्थी के कलम से….
मैनपुर। ब्लॉक के कोतरा डांगरी प्राथमिक शाला में इस वर्ष चिल्ड्रन्स डे का आयोजन बच्चों के लिए उत्सव नहीं, बल्कि खतरे से घिरा हुआ दिन साबित हुआ। जहां पूरे देश में बच्चों के अधिकार, सुरक्षा और शिक्षा के नाम पर भाषण दिए जा रहे थे, वहीं इस गांव के मासूम एक जर्जर और खतरनाक स्कूल भवन के नीचे एफ.एन.एल. मेला मनाने को मजबूर थे। टूटती दीवारें, झूलती छत और बाहर निकले सरिए—यही इस स्कूल की दुखद हकीकत है।
कमार–भुंजिया जनजाति, जिन्हें सरकार अपना दत्तक पुत्र बताती है, उसी समुदाय के बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं। इन बच्चों की पढ़ाई तो आगे बढ़ रही है, लेकिन उनकी जान हर दिन खतरे में लटकी रहती है। शिक्षक भय के माहौल में पढ़ाने को विवश हैं, जबकि अभिभावक हर सुबह अपने बच्चों को भेजते हुए मन ही मन प्रार्थना करते हैं कि वे सुरक्षित लौट आएं।

चार महीने पहले यही स्कूल समाचारों की सुर्खियों में आया था। दैनिक भास्कर ने स्कूल की भयावह स्थिति को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। लेकिन चार महीने बीतने के बाद भी स्थिति जस की तस है। न कोई मरम्मत, न कोई नई स्वीकृति और न ही कोई दृश्यमान कार्रवाई। फाइलें जैसे धूल चाटने के लिए ही बनाई गई हों।
भीलवाड़ा जैसी दर्दनाक घटनाओं के बाद भी विभाग की नींद नहीं टूटना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या सरकार किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार कर रही है?
विडंबना यह है कि इस स्कूल में शिक्षा का स्तर कई संसाधन-संपन्न स्कूलों से बेहतर है। बच्चे ‘भोजन मंत्र’ का आदरपूर्वक पाठ करते हैं, शिक्षक सीमित साधनों के बावजूद पूरी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं और गांव अपनी संस्कृति एवं अनुशासन पर गर्व करता है। लेकिन संस्कार भवन नहीं बनाते—सुरक्षित ढांचा बनाना शासन की जिम्मेदारी है, और यह जिम्मेदारी लगातार उपेक्षित हो रही है।
विकासखंड स्त्रोत समन्वयक शिव कुमार नांगे का कहना है कि स्कूल के लिए सीएम स्कूल जतन योजना में स्वीकृति मिली थी, लेकिन बाद में निरस्त कर दी गई। अब दोबारा प्रस्ताव भेजा गया है। वहीं विकासखंड शिक्षा अधिकारी महेश पटेल का बयान है कि वे स्वयं स्थल निरीक्षण करेंगे और नए भवन हेतु बात रखेंगे। लेकिन सवाल यह है कि चार महीने तक निरीक्षण की जरूरत क्यों महसूस नहीं हुई?
कोतरा डांगरी के बच्चे सिर्फ एक इमारत नहीं मांग रहे—वे सुरक्षित भविष्य की मांग कर रहे हैं।अब फैसला शासन का है—क्या वह इन मासूमों को सुरक्षा देगा, या फिर इन्हें इसी तरह मौत की छाया में पढ़ने छोड़ दिया जाएगा?
