हमें प्रभु के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें साधनों का धाम मनुष्य शरीर दिया है-मंदाकिनी रामकिंकर


पाटन। आदर्श मानस मंडल पहंदा व श्रीराम किंकर शिष्ष सेवा समिति भिलाई दुर्ग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित श्री राम कथा महोत्सव के द्वितीय दिवस कथा व्यास से’हनुमत चरित्र’ पर कथा कहते  हुए मंदाकिनी रामकिंकर ने कहा कि ‘हमुमान जी, सीता जी की खोज में लंका पहुंचकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और कृत- कृत्यता का अनुभव करते हैं। साधक के कर्म जब पूर्ण हो जाते है और उसे अब कुछ करने की आवश्यकता शेष नहीं रह जाती तब इसे शास्त्रीय भाषा में कृत कृत्यता कहते हैं। इस स्थिति तक पहुँचना मनुष्य शरीर धारण करने का श्रेष्ठतम लक्ष्य है।
शांति और भक्त मयी सीता तक पहुंचने के लिए सौ योजन  के सागर को पार करना होगा। अन्य बंदर सागर तट में ही अटक गए। पूज्य दीदी माँ ने बताया कि यह सागर देहाभिमान का है इसे कोई देह भान से उठा हुआ साधक ही पार कर सकता है। प्रभु श्रीराम के समक्ष सागर पार करने के दो प्रस्ताव आए एक विभीषण जी की ओर से और दुसरा लक्ष्मण जी की ओर से, विभीषण जी ने सागर से अनुनय विनय करने की बात कही और लक्ष्मण जी ने सागर को अग्नि बाण से सुखाकर रास्ता प्राप्त के लिए कहा। रामजी दोनों विचारों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं ‘यहाँ दो दर्शन थे एक प्रवृत्ति मार्ग का और दुसरा  निवृति मार्ग का, राम जी तीन दिन सागर से विनय करते हैं चौथे दिन धनुष में बाण चढ़ा कर क्रोध व्यक्त  करते हैं।

दीदी मां ने कहा कि दिन भर परिश्रम के पश्चात रात में विश्राम की आवश्यकता है। दिन में पाना और रात में भूल जाना। दिन में द्वैतवादी और रात में अद्वैत वादी हो जाने की शिक्षा “हमारा शरीर हमें देता है अत: देह ही गुरु है। अद्वैतवादी बनने पर ही सुख पूर्वक नींद आती है। यह एक तरह से लघु प्रलय ही है आओ हमें विश्राम देता है।
उन्होंने  स्वर्ग सुख का विश्लेषण किया,स्वर्ग की व्यवस्था क्यों । वहाँ भोग ही भोग है, रोग और मृत्यु नहीं है। पर पुण्य की पूंजी खत्म होने पर फिर चौरासी में लौटना पडता है क्योंकि वहाँ ऐसा कोई साधन नहीं है जिससे पुण्य संचित किया जा सके। साधनों का धाम तो मनुष्य शरीर है पर इस शरीर का उद्देश्य भोगों को भोगना नहीं है। क्या स्वर्ग में देवता सुखी है। इस प्रश्न पर भी दीदी माँ ने विवेचना की। मानस के दो पात्र “दशरथ और दशमुख”  दोनों में दश हैं, परन्तु एक साथ रथ जुड़ा है दूसरे के साथ मुख। यह दो जीवन दर्शन है रथ धर्म का प्रतीक और मुख भोग का, रावण पृथ्वी के भोग वस्तुओं से तृप्त नहीं होता स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं का ऐश्वर्य छीन लेता है।
विषय सुख देता है। हम शरीर को साध्य माने कि साधन ? शरीर साध्य है तो हमें दशमुख बनना पड़ेगा और यदि शरीर साधन है तो हम दशरथ बन सकते हैं। प्रलाप भानु एक धर्मात्मा राजा था परन्तु महात्वाकांक्षा के चलते रावण बन गया उसके निष्कामता के प्रदर्शन में कपट, पाखंड था। उस के कपट ने ही कसे रावणत्व की ओर उन्मुख कर दिया।
दीदी मां ने बताया कि रामजी का सुग्रीव को दी गई शिक्षा “संतत हृदय धरहु मम काजू” हम सब जीवों के लिए आदेश की तरह है। हमें प्रभु के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए क्योंकि उन्होंने हमें साधनों का धाम मनुष्य शरीर दिया है। इस संदर्भ में दीदी माँ ने विनय पत्रिका का के उस पद का उल्लेख किया जिसमें तुलसीदास जी प्रभु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं’ और विषय विकारों को साधक के जीवन से निकालने की प्रार्थना भी करते हैं।

इस मौके पर दुर्ग लोकसभा सांसद विजय बघेल,खिलावन साहू,नंदलाल साहू, चेतन देवांगन, राजकुमार देवांगन,मोहन साहू,सुरेन्द्र साहू, विश्वकर्मा पाल, मानसिंग पटेल, पीलाराम शर्मा, सुरेखा शर्मा,जितेन्द्र सोनी उपस्थित थे ।

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