सेलूद। बजरंग चौक सेलूद वार्ड 2 में महिला मंडली के तत्वावधान में चल रही श्रीमद् भागवत ज्ञान गंगा में श्री कृष्ण जन्मोत्सव मनाया गया। कथा में जैसे ही श्रीकृष्ण जन्म प्रसंग आया पूरा पांडाल हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल के जयकारों से गूंज उठा। श्रद्धालुओं ने बाल स्वरूप श्री कृष्ण के दर्शन किए और व्यास पीठ पर विराजित भागवताचार्य पं. हरीशंकर वैष्णव ने नन्हें कान्हा को दुलारा। कथा में श्री वैष्णव ने श्रीकृष्ण जन्म के प्रसंग सुनाते हुए कृष्ण की बाल लीला का वर्णन किया। इस दौरान बाल कृष्ण को कंस के कारागार से नंद बाबा के घर ले जाने की झांकी भी प्रस्तुत की गई। उन्होंने कहा कि ययाति के बड़े पुत्र यदु हुए। उन्हीं के वंश में भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्णपक्ष अष्टमी को रात्रि 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ। भगवान कृष्ण ने संसार को अंधेरे से प्रकाश में लाने के लिए जन्म लिया और अज्ञान रूपी अंधकार को ज्ञानरूपी प्रकाश से दूर किया। भगवान कृष्ण को जब वासुदेव यशोदा मैया के घर लेकर जा रहे थे तो शेषनाग ने छाया की और मां यमुना ने चरण छुए। वासुदेव कृष्ण को नंदबाबा के घर छोड़कर यशोदा मैया की कन्या को लेकर वापस कंस के कारागृह में आए।

दान ऐसा होना चाहिए। जो एक हाथ से दें तो दूसरे हाथ को पता न चले। उन्होंने कहा कि दान दो, पर उसका बखान मत करों। उन्होंने कहा कि जो अच्छे कर्म करते हैं। वे कभी मन में फल की इच्छा नहीं रखते है। क्योंकि फल देने वाले की नजरे तो सदैव आप पर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि संकल्प में विकल्प मत खोजिए। लक्ष्य प्राप्त करने के लिए संकल्प लें और अपना कर्म करते रहें। जीवन में भटकाने के लिए विकल्प बहुत मिलेंगे। लेकिन संकल्प लेकर चलें तो सफलता जरूर मिलेगी। उन्होंने अजामिल के प्रसंग पर कहा कि संसार में ब्राह्मणों को ब्राह्मणदेव कहा गया है। ब्राह्मण अगर आपके घर में आगर भोजन करते हैं तो उनके आशीर्वाद से घर के दोष दूर हो जाते हैं। ब्राह्मण के कहने पर अजामिल ने अपने 10वें पुत्र का नाम नारायण रखा था और नारायण को पुकारते-पुकारते उसे सद्गति मिल गई।

कथा में उन्होंने राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन करते हुए कहा कि श्याम से मिलना है तो राधाजी को याद करों। श्याम प्रभु तो दौड़े चले आएंगे। उन्होंने कहा कि राधा-कृष्ण के मिलन का निमित मोर था। जिसके कारण प्रभु मोरपंख धारण करते हैं। राधा और कृष्ण अगल-अलग नहीं है। लेकिन जो राधाकृष्ण को अलग-अलग माने वह नरकीय जीव है। राधा और कृष्ण तो एक ही नाम है। उन्होंने कहा कि जो प्रभु की चरण-शरण हो जाता है। प्रभु उसे तार देते हैं और जो विपरित चलते हैं।
